Saturday, 10 September 2016

अलग एंगल ...

अभी दो या तीन दिन बीते होंगे की श्वेता के साथ किसी से मिलने गया था , शायद कोई काम था और मेरी हमेशा से परेशानी रही है की कभी मिलने मिलाने में कम्फर्टेबल नहीं हो पाया । तो जब कभी भी कहीं जाता हुँ तब अगर समय से सब ठीक हो जाए तो माशाअल्लाह और ना हो तो निगाहें एक कहानी ढ़ूँढ़ने लगती है और हर बेमतलब की चीज में कारण , कुछ लोगों को यह बाते मजेदार लगती हैं और कुछ को ड़सना लेकिन अब क्या कर सकता हुँ सालों की आदत एकबारगी तो छुटती नहीं है ।
वहाँ बैठा था और इंतजार का सिलसिला बदस्तुर जारी था , करीब 10-15 मिनट हो चुके थे लेकिन तबतक आँखों ने अपना खिलौना ढुँढ लिया , वहाँ कुछ हीं दूर दीवार पर एक Aquarium लगा था जिसमें कुछ मछलियाँ कैद थीं , उनके मुँह लगातार चल रहे थे , लोग कहते हैं की वो इस तरह साँस लेते हैं मगर सच कहूँ तो मैं उनकी गालियाँ सुन सकता था । कुछ ही देर बीता होगा की एक सवाल मन में कौंधा .....

ऐ यहाँ कैद क्यों हैं ?

अब सवाल के साथ जवाब तलाशने की दौड़ में निकल पड़ा , मैं रोज जब अपने कमरे से क्लास के लिए निकलता हुँ तो रास्ते में एक नाला पड़ता है , वहाँ पर भी मछलियाँ हैं । वह गंदी हैं , बदबुदार हैं मगर आजाद हैं , बिल्कुल आजाद .. शायद इनको डब्बाबंद चारा ना मिलता हो मगर वह कैद नहीं की जाती उनका अपना जीवन है जो किसी के आँखों के सुकून भर में सिमट नहीं जाता है ।
तो क्या उन कैद मछलियों का जुर्म सिर्फ इतना है की वह खूबसूरत हैं , क्या उनकी पीठ पर वो सुनहरी धारिया हीं उनकी सलाखें हैं ?

क्या है की विश्व का दिमाग या कहुँ तो इन्सानी दिमाग बड़ा Conservative रहा है और हमने समय के साथ खूबसूरती के मायने तो बदले हैं लेकिन कुछ है जो नहीं बदला तो वह है खूबसूरती के प्रति हमारा व्यवहार , हमारा नज़रिया । सच कहुँ तो हम कितना भी खुद को सांत्वना दे लें लेकिन खूबसूरती हमेशा एक अभिशाप रही है , मैंने बहुत सोचा मगर एक उदाहरण नहीं सोच पाता जब खूबसूरती ने अपना साइड़ इफेक्ट नहीं दिखाया हो ।

आप खुद ही अपने आस पास देखें , अगर एक साधारण लड़की या लड़का किसी मुकाम तक पहुचें तो वह मेहनत होती है लेकिन जरा सी खूबसूरती जुड़ते ही वह मेहनत नहीं रह जाती । ना जाने कितने ही दंगलो के लिए आज भी परोक्ष तौर पर खूबसूरती हीं जिम्मेदार मानी जाती है ,आप विश्वयुद्द से लेकर रामायण महाभारत का उदाहरण ले सकते हैं ।

अब देखिए जो है की ऐसा लिखके आपकी खूबसूरती को DEMORALIZE करने का मेरा कोई इरादा नहीं है , इश्वर आपको सदैव खूबसूरत बनाए रखे ।


जरुरत है बस सोचने की एक बार ।

Friday, 2 September 2016

अंतहीन सफ़र...........

आज जब आँखें खुलीं तो उनमें एक अजीब सी चमक थी , वह ना चाहकर भी बार बार मुस्कुरा रही थी । काम तो वही था रोज की तरह लेकिन उस काम में भी एक लय एक अजीब सी थिरक थी आज ।
जब उस आधे शिशे के सामने खड़ी हुई तो खुद को लगातार निहारे जा रही थी एक सम्मोहन का शिकार होती जा रही थी , करीब 5 साल हो गए जब वह इस शिशे को उस मोटी बुड्ढी के बरामदे से उठा कर लाई थी , अपने दोस्तों को उस रोज की कहानी सुनाकर अक्सर मिनी अपने दोस्तों के साथ ठहाके लगाया करती थी , किस्सा था ही मजेदार , सब कितना डरते थे उससे मगर उस दिन मिनी ने उसके दात खट्टे कर दीए थे , कितना तेज भागी थी वो उस शीशे को लेकर , बुढ़िया तो 5 मिनट में हाफ़ने लगी थी ।
आज मगर उसके होठों पर हँसी नहीं मुस्कुराहट थी , पिछले पाँच सालों में पहली बार वह खुद को इतने प्यार से , इतने बारीकी से देख रही थी ।
उसके चमकते ललाट पर बार बार उसके काले बाल जो अब कुछ हद तक भुरे दिखने लगे थे , अटखेलीयाँ कर रहे थे , नाक मानों उन इन दो बड़ी ब़ड़ी आँखो के बीच से सर्रर से किसी खुबसुरत से ढ़लान के जैसी लग रही थी , होंठ तो मानों मुस्कुराते मुस्कुराते थक सी गई थी मगर गालों के बीच की लाली इन सब से अलग अपनी ही कहानी कह रहे थे और इन सब को समेटे एक प्यारा सा चेहरा जैसे किसी कलाकार की सबसे अव्वल रचना हो , मगर उसके उन बालों को हटाने के लिए जब उसने हाथ बढ़ाए तो वेग से बह रही उस अनंत ख्यालों की रेल को एक ब्रेक सा लग गया ।
कितने काले पड़ गए हैं हाथ उसके , जगह जगह से स्याह पड़ गए हैं , मंजु चाची भी अक्सर कहा करती है, अभी मिनी के 2 महिने पहले ही तो 18 साल हुए हैं लेकिन हाथ जैसे किसी अम्मा के हों । अब रोज न जाने वह हाथ कितने ही कच़डे की पेटियों को तलासते हैं वह नरम कैसे होंगे , लेकिन बस अब वह अपना पुरा ख्याल रखेगी , फ़ैसला कर लिया था मिनी ने एक वक्त खाना ना खाएगी तो कोई बात नहीं मगर आज आते वक्त साबुन लेकर आएगी , अब राख से हाथ साफ़ नहीं करेगी वो ।
जब से होश सँभाला मिनी ने खुद को शहर के कोने में बसी बस्ती में ही पाया है , ना कभी अपने अब्बा को देखा ना किसी रिश्तेदार को लेकिन माँ की शक्ल उसे कुछ कुछ याद है । एक दिन अम्मा काम पर गईं थी मगर वापस नहीं आई , गाँव वालों ने ना जाने कितनी ही बातें कहीं मगर मिनी ने हौसला नहीं हारा , दो दो दिन तक भूखी रही लेकिन कभी किसी और से नहीं माँगा । काम की बड़ी पक्की है वो पुरी बस्ती तारीफ़ करता है उसकी , दिन भर मेहनत कर लेती है और अब तो पैसे भी बचा लेती है , पिछले सप्ताह पुरे 50 रुपए बचाए थे और मेले में भी गई थी ।
अब लेकिन काम नहीं करेगी मिनी बिल्कुल भी नहीं , आज वह सागर से मिलने जा रही है । मुश्किल से महीने भर पहले तो मिली है वो लेकिन लगने लगा है की साल बीत गए हैं , वह उसकी तरह काम नहीं करता स्कूल जाता है , नहीं नहीं कॉलेज में पढ़ता है , सागर की नौकरी भी लग जाएगी वह कहता है फिर दोनों इस शहर को छोड़ कर चले जाएँगे , दिल्ली में रहेंगे । दिल्ली का सोचकर खुश हो जाती है वो , वहाँ बिजली होगी और पानी के लिए लाईन भी नहीं लगाना पड़ेगा ।
उस दिन कितनी खुश थी वह मेले में , वहीं तो मिली थी सागर से । लगातार घुरे जा रहा था उसको , पहले तो लगा की कोई लफंगा होगा मगर जब एक बार बात की तो उसकी बातों में बहती चली गई जैसे , कितनी मिठी बातें करता था , कविताँए भी लिखता था , अपना मोबाइल भी था , कितनी फोटो ली थी उसने मिनी की , वह कहता smile और मिनी खिलखिला कर हँस देती ।
जब सागर से मिलकर वापस आई तो वह कुछ ज्यादा ही खुश थी वह , आज सागर ने कहा की उसको नौकरी लग गई है वो दोनों अगले हफ्ते की रेल से दिल्ली चले जाएंगे । पहली बार रेल बैठने का सोच कर डर रही थी मिली लेकिन फिर सागर साथ होगा यह सोचकर ड़र काफुर हो जाता ।
क्या क्या ले जाएगी वो अपने साथ ? कितनी बेवकुफ़ी वाला सवाल है , है ही किया उसके पास दो बर्तन और कपड़े और माँ की दी हुई वो वाली माला , मोतीयों वाली , उसमें भी कुछ मोतियों का रंग उतर गया है मगर कैसे फेंक दे एक वही गहना तो है उसके पास । सागर ने कहा है बस खाली हाथ आ जाने को , दिल्ली में उसके लिए नए कपड़े लेगा वो ।
अगले एक हफ्ते तक सो भी नहीं पाई वो , अपनी झोपडी रामु काका को दे दी , बेचारे सड़क पर सोते थे , घंटो आशीर्वाद देते रहे थे उसको ।
रेलगाड़ी में बैठने के बाद उसका ड़र खत्म हो गया , सागर से रास्ते भर बस दिल्ली का हाल पुछती रही वह और सागर मुस्कुराकर बताता रहा , सागर ने बताया उसके परिवार में भी कोई नहीं है , कितनी मिलती है उनकी कहानी मिनी भी तो अकेली है दुनिया में । अब वो कभी सागर को अकेलापन महसुस नहीं होने देगी , उसका पुरा ख्याल रखेगी , इन्हीं ख्यालों में कब उसने सागर के कँधो पर सर रखकर आँखे मुँद ली पता ही नहीं चला , एक सुकुन था उसके बाहों में जैसे जिंदगी बस रुक सी गई हो सब थम गया हो ।
जब आँखे खुली तो ट्रेन लगभग खाली हो गई थी सागर जल्दी जल्दी जुते पहन रहा था और उसे उठा रहा था ।
सागर ने कहा की उनके रहने का इतंजाम हो गया है अब उनकी जिंदगी राजा की तरह कटेगी , दोनों एक कमरे में पहुँचे थोड़ा छोटा था मगर कितना प्यारा , वह कमरा उसे उसे स्वर्ग लग रहा था और सागर के चेहरे में कोई देवदुत , कितनी बदल गई थी उसकी जिंदगी पिछले महिनों में , बिना मतलब कोसती थी वह उपर वाले को ।
सागर और वह कपड़े बदलकर वहीं लेट गए , रात भर एक दुसरे में इस कदर खो गए मानों की दो नहीं एक शराीर हो , प्यार को साबीत करने का वो अंतहीन सिलसिला रात भर चलता रहा । पहले भी सागर ने कहा था उसको लेकिन मिनी हर बार टाल देती थी , साथ की लड़कीयाँ कहती थी यह सही नहीं है लेकिन बस अब और नहीं आज तो वह खुद को सागर को सौंप देना चाहती थी , अब कोई कारण भी तो नहीं था दुरी बनाने का , आखीर अब दोनो एक हो गए थे ।
सुबह सागर उसे लेकर अपनी मौसी से मिलने के लिए चलने को कहा , नए कपड़े और गहने लेकर आया था वो कहा की मौसी के साथ मंदीर जाकर के शादी कर लेंगे फीर साथ हमेशा के लिए । मौसी भी बड़ी खुशमिजाज थी , बात बात पर हँसी मजाक कर रही थी , सबने साथ में खाना खाया और सागर शादी के सामान लाने बाहर चला गया ।
जब से खाना खाया था मिनी को निंद आ रही थी तो वह सोने को चली गई , जब वह सोकर उठी तो सागर वहाँ नहीं था । जाकर मौसी से मिली तो उन्होनें उसे अँधेरे कमरे में धकेल दिया , ना जाने कितने दिनों तक खाना नहीम दिया पानी भी नहीं । जब बाहर निकाला तो कई गिद्ध की भाँती उसपर टुट पड़े, उसकी बोली लगी । एक छोटे से कमरे में , बस एक बिस्तर में सिमट गई थी मिनी की जिंदगी , साथ की लड़कीयाँ कहती थी की एक लाख में उसका सौदा हुआ था लेकिन मिनी मानने को तैयार नहीं थी जरुर इन लोगों ने उसके सागर के साथ कुछ कर दिया होगा ।
रोज ना जाने कितने मर्द उसके कमरे में आते , इसके रुह को छलनी करते मगर आज भी मिनी हर चेहरे में सागर को ढुँढती थी , ना जाने कब आएगा वो शादी का समान लेकर ।

अंतहीन सफर जारी है , आज भी मिनी सागर के पसंद की गुलाबी साड़ी ही पहनती है ।।।

Tuesday, 2 August 2016

ये तो बस Precaution था.......

राजनीति की चौपड़ पर अंग्रेजों ने एक विशेष चाल चली। इसका राष्ट्रीय घटनाओं के समूचे भविष्य पर भारी प्रभाव पड़ा , इतना भारी की अंग्रेजों ने शायद कभी उसकी कल्पना भी नहीं की होगी । अंग्रेज 1857 के झटके तो किसी तरह से झेल गए ,लेकिन  जनता और सैनिकों की रोष की ज्वाला भीतर ही भीतर बराबर सुलगती रही ।
यदा कदा वह किसी न किसी बहाने देश के कुछ हिस्सों में फुट निकलती थी । वासुदेव बलवन्त फड़के के नेतृत्व में महाराष्ट्र में और पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में जिन क्रांतिकारी धमाकों ने अंग्रेजी सरकार को अन्दर तक हिला के रख दिया ओ तो समुन्द्र में बस बून्द भर के समान थी ।

एलन ऑक्टविअन ह्यूम नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने , जो 1857 की भीषण यातना को भोग चुका था और जो खरगोश की तरह चौकन्ना रहता था , आने वाले विस्फोट की गडगडाहट को स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था । देश भर में फैले तीस हज़ार से भी अधिक सुचनदाताओं से ह्यूम को यह पक्का निश्चय हो गया था की सामान्य जनता के आर्थिक कष्टों और बुद्धिजीवियों के उपेक्षा के कारण निकट भविष्य में एक भयंकर विस्फोट होने का संकट पैदा हो गया है ।

कैसा होगा ये भयंकर विस्फोट , उसके बारे में ए. ओ . ह्यूम के बायोग्राफी में विलियम बेडरबर्न ने लिखा है - " अनगिनत प्रविष्टियों से पता चलता है की गुप्त रूप से पुरानी तलवारों, भाले और तोड़ेदार बन्दुके एकत्र की जा रही हैं जो जरुरत पड़ने पर तैयार मिलेंगी । ऐसा कहा गया है की अचानक हिंसा भड़केगी , चारों ओर अपराधों का बाजार गर्म हो जायेगा , अवांछित व्यक्तियों की हत्या होगी , महाजनों और बाजारों को दिन-दहाड़े लूटा जायेगा । लोग तो इस समय अधभूखे , अधनगें हैं ही । शिक्षित वर्गों का एक छोटा सा वर्ग जो इस समय शायद अकारण ही सरकार का घोर विरोधी है , आन्दोलन में भाग लेगा , यत्र - तत्र नेतृत्व संभालेगा , आंदोलन समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा " । (1)

ह्यूम को अब पूर्ण विश्वास हो चला था की बढ़ती हुई अलोकप्रियता को कम करने के लिए तत्काल एक ठोस कार्यक्रम की आवयश्कता है ।

ह्यूम ने स्वयं स्पष्ठ रूप से कहा है की कांग्रेस की स्थापना के पीछे उनका क्या उद्देश्य था - " इस बात की तत्काल जरुरत है की हमारे अपने कार्य के फलस्वरूप जो बड़ी शक्तियां उभर रही हैं उनसे छुटकारा पाने के लिए कोई रक्षोपाय किया जाये और हमारे कांग्रेस आन्दोलन से बढ़कर क्या कोई अन्य रक्षोपाय हो सकता है ? (2)

डॉक्टर पि . सितराम्मैया ने " Indian national congress " का जो अधिकृत इतिहास लिखा है , उसमे भी कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि की पुष्टि की गयी है : " श्री ह्यूम के पास इस बात का अकाट्य प्रमाण था की राजनीतिक असंतोष भीतर ही भीतर सुलग रहा था ..... उसके आधार पर ह्यूम ने निश्चय किया की इस असंतोष को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कोई द्वार तैयार किया जाये और कांग्रेस ही सुरक्षा-द्वार बन सकती है । " (3)

प्रारंभ में तो कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन पूर्णतः उसके संस्थापकों की चाहतों की हिसाब से चला । जो कार्यक्रम तैयार किया गया और जो नेता सामने लाये गए , उनका उदेश्य राष्ट्रीय मंच पर एक नए नेतृत्व को लाना था , जिसकी प्रथम योग्यता यह हो की ओ आँखे मूंद कर के ब्रिटिश राजछत्र के प्रति निष्ठावान रहे ।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 में बम्बई में हुआ , दूसरा कोलकाता में और तीसरा मद्रास में हुआ । प्रत्येक अधिवेशन में कांग्रेस प्रतिनिधियों की प्रसंशा सम्बद्ध अंग्रेज गवर्नरों ने की । वास्तव में सर्वप्रथम तो यह भी निश्चय किया गया था की बम्बई का गवर्नर स्वयं प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करे , लेकिन बाद में यह विचार त्याग दिया गया , क्योंकि उससे उनके इरादों का खुलेआम ढिंढोरा पिट जाता । अंतिम समय में व्योमेस चंद्र बनर्जी को अध्य्क्ष बनाया गया । जैसी की आशा थी की , अद्यक्षिय भाषण में इस बात के लिए भूरी- भूरि प्रशंशा की गयी थी की - " अंग्रेज़ी राज की कृपापूर्ण घनी छाहँ में देश को अनेकानेक लाभ प्राप्त हुए । "

कांग्रेस के द्वितीय अध्य्क्ष दादा भाई नौरेजी ने विनम्रता और गर्व से कहा की वे ब्रिटिश साम्राजय की दूसरी शिला रख रहे हैं ।

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने , जो 1895 के अध्य्क्ष थे , ने कामना की कि ब्रिटिश साम्राज्य अमर हो और 1902 में उन्होंने पुनः कहा की भारतीयों की सर्वोपरि चाहत थी की उन्हें स्वासशि देशों के उस महासंघ में स्थान मिले , इंग्लैंड जिसकी महिमामयी माता थी ।

यह स्मरण रखना होगा की दादा भाई नौरेजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - जैसे महारथी उस काल के सबसे बड़े राष्ट्रवादियों में से थे ।

(1)-  वेडरबर्न - Life history of A.O. hume
(2)- तदेव - पृ- 77
(3) - P. sItaramaiya - The history of indian national congress


                             - और देश बँट गया
                               हो . वी . शेषाद्रि

Thursday, 7 July 2016

एक चिठ्ठी और.....

आदरणीय रविश जी एवं रोहित जी
नमस्कार

कल से आपके पत्रों की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ , माफ़ी चाहता हूँ इस गुस्ताखी के लिए लेकिन आपको पढ़ कर सुन कर हमेशा प्रेरित होता रहा हूँ तो इस बार भी खुद को रोक नहीं पाया ।
मैं किसी चैनल का एंकर नहीं हूँ न ही मेरे किसी रिश्तेदार को राज्यसभा की सदस्यता , निरपेक्षता ही हद समझ लीजिये की अब तक सरकार ने वोट का अधिकार भी नहीं दिया है । अभी पिछले ही साल पत्रकारिता की पढाई करने आया हूँ । साइन्स से बारहवी करने के बाद घर वालों को इसके लिए मना पाना आसान नहीं था , बहुत से सवाल थे और जिद भी करनी पड़ी और अंत में जाकर साथ में competiton की तैयारी भी करता रहूँगा इस नसीहत के साथ आने की इजाजत मिली ।

जब विश्वविद्यालय में कदम रखा तो बड़ा खुश था और हौसला कुछ ज्यादा ही मजबूत लेकिन जब पहली ही क्लास में इंट्रोडक्शन के दौरान पूछा गया की पत्रकारिता क्यों करना चाहते हो तो कुछ का जवाब था ग्लैमर , टीवी पर दिखना और कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला था की कहीं और admisson नहीं मिला इसलिए ( ओ 5-6 लाख नहीं देते हैं , 60 हज़ार वाले कूड़े का ढ़ेर हैं ) लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी क्यूंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।

कुछ ही फिन बीते होंगे की सीनियर्स के साथ उठना बैठना सुरु हुआ तो पता चला की ओ पत्रकारों को मीडिया मजदुर कहते हैं और जहाँ मैं 15-20 समझ रहा था 7 हज़ार की नौकरी मिलती है । एक को पढ़ा की अगर पत्रकार बनना है तो सर्विस वाली लड़की से शादी करना , अभी एक बैच आँखों के सामने से पास आउट हुआ उनमे से एक ने लिखा की पत्रकारों के भूखे मरने की नौबत आ रही है ( सबकी लेखनी फेसबुक पर हुई थी ) लेकिन मेरा हौसला बना रहा क्योंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।

एक कदम आगे बढ़कर इंटर्न ज्वाइन किया तो उन्होंने सलाह दी की जो 60 हज़ार यहाँ विश्वविद्यालय में दोगे उसकी जगह ठेला लगालो ज्यादा फायदे में रहोगे । पहले ही दिन एक प्रोफेसर सर ने कहा था की " दुःख होता है जब तुम जैसे लोग हर साल जिंदगी ख़राब करने आते हैं " लेकिन मेरा हौसला बना रहा था ।

मुझे तो दो दिन हुए हैं लेकिन माँ बाप को लगता है बेटा पत्रकार बन गया है , जब कहीं किसी पत्रकार पर हमले की या मौत की खबर आती है तो रात भर फ़ोन आते रहते हैं , कभी कभी तो मुझे भी सपने आने लगते हैं लेकिन हौसला नहीं हारा ।
आपको पढ़ा तो लग रहा है ये कैसा पेशा है शिर्ष पर होने के बावजूद दो लोग अपनी मानसिक पीड़ा में पत्रकारिता को भूल गए , नयी पीढ़ी को हौसला देने के बजाये रविश कुमार ने हमें एम . जे . अकबर बन ने की सिख दी ( उन्ही एम जे अकबर को पत्रकारिता का बिचौलिया भी कहा है ) , आपने पत्रकारिता कर रहे लोगों को हौसला देने की जगह उन्हें कूड़े का ढेर कहा और हमारे रोहित जी को भी समस्या इस बात से नहीं की बात क्या है उन्हें अपना राष्ट्रवाद दिखाना है । अब सोच रहा हूँ पापा को फ़ोन कर ही दूँ की मई घर आ रहा हूँ , क्योंकि मैं ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आया था ।

मैंने कहा की ये तो कस्तूरी और हिरन की जैसी लड़ाई है , अपने ही नाभि के सुगंध को ढूंढने में ये प्राण दे रहे हैं , ये अपनी आपसी टकराव में पेशे को बदनाम कर रहे हैं लेकिन बाद में बताया की नहीं ये स्वहित की नहीं विचारधारा की लड़ाई है ।

मैं नहीं जानता ये किसकी लड़ाई है लेकिन दाव पर पत्रकारिता लगी है , आपके पुर्वजों ने आपके हाथों में पत्रकारिता को एक हथियार बना कर दिया था ताकि आप कमजोरों की लड़ाई लडें अब देखना है की आप हमारे हाथों में पत्रकारिता को क्या बना कर देते हैं ।

आपकी अगली पीढ़ी ।

Friday, 29 April 2016

मैं हुँ ही सवाली - बाबा साहब अंबेडकर - I

जब विश्व प्रथम विश्व युद्ध की चपेट में था । लाला लाजपत राय उस समय अमेरीका में थे जब आंबेडकर अपना अध्धयन कर रहे थे । श्री 'एडविन ' लाजपतराय के घनिष्ट मित्र थे , वे प्रोफेसर थे । आंबेडकर उन्हें अच्छी तरह जानते थे । ब्रिटिश खुफिया विभाग के अफसरों का ख्याल था कि आंबेडकर "भारतीय क्रांती दल " के सदस्य हैं । प्रोफेसर एडविन को भारतीय राजनीतिक दल से जोडने की पेशकश कर चुके थे , किन्तु आंबेड़कर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था "वह विधार्थी हैं और उनको महाराजा बड़ौदा को दिए गए वचन के अनुसार पूरा ध्यान अघ्धयन पर केंद्रीत करना है , क्योंकी उन्हें ऐसा स्वर्ण अवसर प्रदान किया है जिसे वो किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं ( राष्ट्र की किमत पर भी नहीं )" ।। 1 &  2
कहते हैं

।। होनहार बान के होत चिकने पात ।।

आंबेडकर के चिकने पात भी हमें उनके छात्र जिवन से ही मिलने लगते है । जब राष्ट्र अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा था और एक बालक का भी रक्त उबाल मार रहा था की वह राष्ट्र के लिए जान दे दे , तब भारत के एक महान "पुत्र" को राष्ट्र की नहीं अपने अध्धयन की चिंता खाए जा रही थी ।

मैं अब तक नहीं समझ पाया की विदेशों में ऐसी कौन सी पढ़ाई उस वक्त करवाई जाती थी जो की लोगों को जनता से जुड़ना सिखाती थी । क्युँकी हमारे सारे राष्ट्र निर्माताओं का सृजनकर्ता कोइ और रही विदेशी संस्थान रही है । नेहरु , गाँधी , आंबेडकर आदी अधिकतर नेताओं को भारतीय जनता के दर्द का एहसास विदेशों में सैंपेन की ग्लास खनकाते हुए हुआ । भारतियों के भुखे पेट का एहसास उन्हें तब हुआ जब वो अपने माशुकाओं के साथ मखमली बिस्तरों मे लेटे हुए थे ।
राजेश नायक जी के सलाह पर मैनें आंबेडकर को पढ़ने , अथवा गंभीरता से पढ़ने की शुरुआत की । आज जब मैनें आंबेड़कर से जुड़े कुछ साहित्य को पढ़ लिया तो कुछ सवाल मेरे मन में आए जिनका जवाब कोई भी ग्रंथ मुझे नहीं पाया । मैं किसी का विरोधी नहीं हुँ बस कुछ सवाल हैं जो मन में उठते हैं । आपसे निवेदन है की बिना किसी पुर्वाग्रह से ग्रसीत हुए मेरे सवालों को पढ़ें एवं अगर सँभव हो तो मेरी शँकाओ का समाधान करें ।

पुरे समय के दौरान मुझे एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिला जिसमें राष्ट्र को अँग्रेजों के पाष से मुक्त कराने के किसी संघर्ष में आंबेडकर ने प्रत्यक्ष भुमिका निभाई हो या गरीब किसानों के या मजदुरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई हो । उनका संपुर्ण संघर्ष एक कमरे में सीमित था जहाँ बैठकर आप समाजिक इंजीनियरिंग का खाका तैयार किया करते थे । अत:  आंबेडकर का स्वतंत्रता अथवा समानता संग्राम केवल विचारों तक में सीमित था , अब अगर केवल विचारों से कोई मसिहा माना जा सकता है तो "राहुल गाँधी के विचार कौन से बुरे हैं ?"
आज अगर कोई व्यक्ती स्वतंत्रता सेनानी है तो उसका सत्यापन और पेंशन भी इसी आधार पर होता है की उसने कितना समय अंग्रेजी शासन के दौरान जेल मे बिताया क्योंकी अंग्रेजों के मुताबीक किसी भी स्वतंत्रता सेनानी की असल जगह जेल में होती थी । इस आधार को मान के चलने पर तो आंबेडकर साहब स्वत्रंता सेनानी भी नहीं थे , क्युँकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबा साहब की एक भी रात जेल में नहीं कटी । तो फीर किस आधार पर उनके स्वतंत्रता सेनानी होने का दंभ भरा जाता है ? जबकी वह तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के भी अधीकारी नहीं हैं ।

सन् 1931 जब पुरा देश कराह रहा था हर तरफ से उत्पिडन की खबरें आ रही थी , माँ बहनों की अस्मत खतरे में थी । वह ऐसा दौर था जव एक आम भारतवासी साँस लेने से भी पहले भारत के आजाद होने का सोचता था तब बाबा को गोलमेज सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधीत्व का अवसर मिला मगर वहाँ आजादी के लिए मुखर तौर पर आवाज उठाने के बजाय , आप गोलमेज सम्मेलन में भारत की बुराई करने में लगे थे और आपको भारत के लिए स्वतंत्रता नहीं बल्की  " आरक्षण " चाहीए था । अब अगर एक अंतराष्ट्रिय सम्मेलन में जाकर अपने मातृभुमी को कोसना , अवगुन गिनाना गलत नहीं है , तो आजम खान ने UN को चिट्ठी लिखकर क्या गलत किया ?  

हिँदु समाज को सुधारने का ठेका लेकर आपने "हिँदु कोड बिल" का रोना रोया और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ -मनुस्मृती को जलाया- । हिँदु कोड़ बिल में सबसे महत्वपुर्ण बात दो शादियों के प्रचलन को रोकना था , मगर अचरज की बात है की सन् 1948 में जब आपकी उम्र 55 वर्ष थी तो आपने शारदा कबीर नाम के ब्राहमन महिला से 15 अप्रैल 1948 को दुसरा विवाह कर लीया । जिनका नाम उसके पश्चात बदलकर सविता आंबेडकर कर दिया गया ।
तो क्या ।।हाथी के दाँत खाने को कुछ और दिखाने को कुछ और ।।

ऐसे और दर्जनों प्रसंग हैं जिनका वर्णन अगली कड़ी में करुँगा तब तक आपसे विनम्र निवेदन है की इस बाल मन की शंका को दुर करें और मुझे बताँए की मैं क्यों आंबेडकर को सम्मान दुँ ।।

मैं क्युँ उनपर आरोप ना लगाउँ ?



1. डा. राजेन्द्र मोहन भ़टनागर           डा. आंबेडकर जिवन और दर्शन --- पृष्ट  10 - 34
2. डा. जी. पी . काशिव               डा. आंबेडकर के विचार    --- पृष्ट  80 - 95


Tuesday, 5 April 2016

अँधा इतिहास : अँधे हम

आज जब हम भारतीय इतिहास की या स्वतंत्रता के 10-20 वर्षों के बाद के भारत की करते हैं तो जिन दस्तावेजों का या जिन किताबों का हम उद्धरण हम लेते हैं वो उस वक्त को अपने हिसाब से ढालने वाले एकमात्र सगंठन कांग्रेस और उस विचारधारा से सबंधीत लोगों सो संबदीत होती है । भारत का संपुर्ण इतीहास माना जाने वाला भारत की खोज भी हमारे सम्मानीय प्रथम प्रधानमंत्री महोदय जवाहर लाल नेहरु के द्वारा लिखा गया है । मेरे एक मित्र के द्वारा दिया गया तर्क याद आता है की " क्या आपने कभी किसी पुलिस थाने में जाकर खुद के खिलाफ़ कोई शिकायत लिखवाई है , की आज मैं बिना हेलमेट के गाड़ी चला रहा था ?"
जब आपको इस बात का ज्ञान हो की आपके द्वारा लिखा जा रहा दस्तावेज भवीष्य में आपके ही महानता की वर्णन गाथा बनेगी तो मैं कैसे मान लुँ की खुद को श्रेष्ट सिद्ध करने के लिए आपने उसमें अपनी सहुलियत के हिसाब से छेड़खानी नहीं की होगी ।
मैं हमेशा से मानता रहा हुँ की भारत का जो संपुर्ण इतिहास हम पढ़ते आए हैं वो विभत्स है अधुरा है । इतीहास को पढ़ते वक्त हम उस हाथ में लाठी लिए अँथे पुरुष की भाँती होते हैं जो खुद कुछ नहीं देख सकता , उसे अपने आस पास के सारे वातावरण का अंदेशा उस व्यक्ती के हिसाब से लगाना पड़ता है जो हाथ पकड़ कर उसे रास्ता दिखा रहा है । इतीहास का अध्यन करते वक्त हम भी अँधे हो जाते हैं एवं बस इतिहासकार की उँगली पकड़कर अपना फैसला सुना देते हैं ।।
आज अगर कोइ ऐसा व्यक्ती जो मुझसे बहुत प्रभावीत है मेरे विषय में एक पुस्तक लिखकर मेरे गुणों का बखान करता है, और वह पुस्तक सैकड़ों सालों के बाद किसी के द्वारा पढ़ा जाता है तो मैं निश्चित तौर पर उस व्यक्ती के लिए मर्यादा एवं आदर्शों की मुर्ती बन जाउँगा जबकी वास्तविकता उसके बिल्कुल उलट क्युं ना हो , ठीक इसी तरह मेरे विरोधी के द्वारा लिखी गई एक किताब भविष्य की निगाहों में मुझे दानव सिद्ध कर सकती है ।
आज जिन नेताओं को हम भारत का युगनिर्माता मानते हैं उनको आदर्श सिद्ध करने वाली अधीकतर रचनाँए उस काल की हैं जब वो सत्ता में अथवा शक्ती के केन्द्र में थे । आज कोइ यह सवाल नहीं पुछता की किन सबुतों के आधार पर विर सावरकर को गाँधी हत्या में दोषी सिद्ध किया गया है ।
कोई नहीं पुछता की कैसे गाँधी हत्या का सहआरोपी रहा दिगम्बर बड़गे जो सरकारी गवाह बनकर गोड़से बँधुओं तथा विर सावरकर के ताबुत की कील बना वो मात्र चँद सालों में रिहा हो जाता है और उसके बाद किस आधार पर भारतीय पुलिस में नियुक्त कर लिया जाता है ।
कोई नहीं पुछता की सरकारी गवाह बना आरोपी मदन लाल पहवा, छुटने के बाद कैसे इतनी समपत्ती जुटा लेता है की बम्बई जैसे शहर में कागज़ की मिलें खरीद लेता है ।
कोई पुस्तक इस बात का विवरण क्यों नहीं देती की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक कहे जाने वाले मोहन दास करमचँद गाँधी को क्यों सँविधान सभा में जगह नहीं दी जाती और स्वतंत्रता संग्राम में शुन्य योगदान रखने वाले भिमराव अँबेड़कर को सिर्फ जातीगत राजनिति के नाम पर संवीधान सभा का सर्वोपरी बना दिया जाता है ?
आजादी के बाद सालों तक भारत में सिर्फ एक पार्टी , सिर्फ एक विचारधारा राज करती रही और सालों के इस बेरोकटोक शासन के दौरान जब विपक्ष नदारद था उन्होनें भारत के इतिहास के अस्मिता के रौंद डाला और योजनाबद्ध तरिके से अपने विरोधियों को खलनायक साबित करने का हर वो सँभव प्रयास किया जिससे की उनका कोइ विरोधी ना पनप पाए और वो एकछत्र राज करते रहें ।

भारतीय इतीहास का समय समय पर विदेशियों तथा अपने हीं नेताओं के द्वारा बलात्कार होता रहा है इसलीय हमारा कर्तव्य है की हम इतिहास को पढ़ते वक्त आँखो के साथ दिमाग भी खुला रखें एवं परदे के पिछे डाल दिए गए तथ्यों पर सवाल उठाँए ।।

Friday, 1 April 2016

कुछ बेरंग रंग

                    इस जमाने में झूठ आखिर कब तक बिकता है,
                   कितना भी पक्का हो रंग एक दिन उतरता है ।।
                   
रंग रंग और रंग हर तरफ कुछ है तो सिर्फ रंग । होली के बाद चढ़ा रंग तो खैर फिर भी कुछ दिनों में उतर जाएगा , अब हाथों में चढ़ा गाढ़ा हरा रंग हल्का पड़ने लगा है , लोग फिर से बेरंग होने लगे हैं । पहले होली से मैं भी डरता था , रंगो से डर था एक खौफ कि कहीं इन बनावटी रंगो में अपना असली रंग ना खो दूँ । ऐसा बिल्कुल नही है की अच्छा रंग था मेरा कोइ खास न तब था न अब है लेकिन जो भी हो वो मेरा रंग था और अपने से प्रेम तो होता हीं है । अक्सर होली के दिन दरवाजे बंद करके छुप जाता था , अपने ही घर में खुद को नज़रबंद कर लेता था ताकि कोई अपने रंग में ना रंग दे ।
आज जब दुनिया को देखना शुरु किया है , जब ऐसे स्थान पर आया जहाँ की वैचारिक स्वतंत्रता मिली है । पंख फैलाने का मौका अब मिला तो क्या देखता हुँ की हर तरफ रंग फैला है , हर किसी ने खुद को रंग रखा है और अपना असली रंग कहीं छुपा दिया है । बचपन की कहानियों में जब कोइ अपनी जान तोते में छुपाता था तो पुरी रात में यही सोचने में निकाल देता था की भला इन्सान अपनी जान तोते में क्यों छिपाए तोते को मारना तो इन्सान को मारने से ज्यादा आसान है , अब अगर छुपाना इतना ही आसान है तो अपनी जान किसी कछुए, हाथी या शेर में छुपाओ की मारने वाला भी हजार बार सोचे । अब समझ रहा हुँ की दरअसल तोते में अपने जान को छुपाने की एक अलग वजह थी , जब अपनी चीज किसी को छुपाने के लिए देनी हो तो हमेशा कमजोर को देना चाहीए क्या पता कहीं ताकतवर को दे दिया और उसने वापस करने से मना कर दिया तो । जिन्होनें अपना रंग छुपाया है वो भी बड़े चतुर हैं वो जानते हैं की अपना रंग अपने पास रखने में बड़ा खतरा है , कहीं किसी ने अपना रंग उन पर दिखाना शुरु किया तो वो बेरंग हो जाँएगे । अब जैसे ही वो बेरंग होने लगते हैं कहीं से दूसरा रंग चढ़ा लेते हैं और कहते हैं की वो तो मेरा रंग था है नहीं , इससे रंग भी बच जाता है और वो रंगने से भी बच जाते हैं ।

इन रंगे हुए चेहरों को पहचानने के लिए कोइ तरीका मैं तो अब तक नही सोच पाया , ऐ रंगे हुए चेहरे खुबसुरत तो लगते हैं लेकीन इन बदलते रंगो के बनावटीपन को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता । कुछ लोगों के शौक इससे भी अजीब हैं वो खुद को तो इन रंगो में रंगे रहते हैं मगर कोशिश होती है की वैचारीक होली खेलते हुए सबको किसी न किसी रंग में रंग दें , साफ चेहरे इनसे बर्दाश्त नहीं होते । मैं अब होली में गुलाल खेल लेता हुँ लेकिन इस वैचारिक होली से आज भी डरता हुँ, अपना रंग मुझे बहुत प्यारा है । 


editor in charge : upasna :D धन्यवाद :)