जाति समाजीक नहीं अपितु एक मानसीक स्थीती है , हमेशा जाति की परिभाषा को बदलने में ,उससे उभरने में लगे रहते हैं लेकिन तबतक जाती अपना
रुप बदल कर हमारे बीच आ जाती है हम शनै शनै उसे स्वीकार करने लग जाते हैं ।जब सबसे पहले जाती व्यवस्था की निंव रखी गई तब यह कर्म
आधारीत था और कर्म के आधार पर व्यवहार था मगर फीर जन्म आधारीत हो गया।आज जब हम खुशीयाँ मना रहे हैं या कहुँ की इस जाती की बेड़ी
से आजाद होने में लगे हैं , तब पता नहीं
क्यों मैं एक नई तरह की जाती व्यवस्था को उभरता देख रहा हुँ , यह भी कर्म आधारीत है और पुरानी व्यवस्था से कहीं
ज्यादा रुढ़ ।
पुरानी व्यवस्था की शुरुआत भी सम्मान के आधार पर हुई थी जो बाद में थोपी जाने लगी , आज भी इसकी निंव सम्मान के आधार पर रखी जा रही है ।
इस व्यवस्था के शिर्ष पर हैं कुछ Lobbyist , Bureaucrats और मीड़िया घराने या मीडिया मुगल , यह पुरानी जाती सभ्यता के ब्राहमण माने जा सकते हैं । यह सत्ता में पुर्ण हस्तक्षेप करते हुए भी निरंतर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं की यह सिर्फ सलाह मात्र देते हैं और बस सत्ता को सही मार्ग दिखाते हैं । इनकी शक्ती का आधार भी इनका ज्ञान है और यह भी इसमें सक्षम हैं की स्थीती चाहे कुछ भी हो यह अपना महत्व बनाए रखते हैं ।
आपके पास इनके कारनामों के कितने भी प्रमाण हो यह वर्ग बचकर निकलना जानता है , य वर्ग सबसे ज्यादा शक्तीशाली है और सम्मान प्राप्त करता है , यह हैं मतलब एकदम स्टड़ टायप वाले इनके पता है की कैसे हमला करना है की " साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टुटे " ।
दुसरे स्तर पर हैं राजनीतिक नेता , सेना और किसान । देखिए जो क्षत्रीय होते थे पुराने जमाने में वो भी दो टायप के होते थे - एक जो सच में शासन करता था और नीति वाला काम करता था और दुसरा वाला लेवल था भौकाली क्षत्रीय , मतलब की शार्ट में ऐसे समझ लीजिए की ऐ लोग क्षत्रीय वाला पुरा शान को ढोते तो थे मगर दरअसल इनको पाला जाता था पहले लेवल वालों के स्वार्थ सिद्धी के लिए । जैसे की देखीए जब कभी जरुरत होती थी की क्षत्रीय गुणों के नुमाईश की तो इनको आगे किया जाता था और इन लोगों के काम से पहले लेवल वालों का गुदा नापा जाता था । जैसे की फलाना राजा के सेना के लड़ाकों ने हजारों को काट ड़ाला या फलाना राजा के जागीरदारों ने करोंड़ों का लगान जमा किया ... तो काम किया कौन ? Second level .... और स्टड़ बनके नाम कमाया कौन ? First level ............
अभी के टायम में आप राजनेताओं को पहले लेवल वाला क्षत्रीय
और किसान और सेना को दुसरे लेवल वाला समझ लीजिए। मतलब कुल मिला के सब ऐश मौज और
ठाठ बाठ़ रहेगा फर्सट लेवल वाले का और जब कभी गुदा साबीत करने की बात आई या कोई
हमला हुआ आपके क्षत्रीय अधीकारों पर तो इनको आगे कर दीजिए और फर्सट लेवल सेक्योर ,
मतलब इन सेकेंड़ लेवल वालों का हाल उन बकरीयों की तरह होता है जिसको खुब अच्छा
अच्छा खिला के और सम्मान वम्मान देके भौकाली तो फील करवाया जाता है लेकिन पालने का
मकसद बेटा होता है , सिर्फ और सिर्फ लास्ट में बली चढ़ाना ।
अब तीसरे स्तर पर होते थे - वैश्य । इस वाले स्तर पर आज भी सबसे कम बदलाव आया है यह कल भी व्यपार करते थे और आज भी करते हैं । कौन राजा है , कौन ब्राहमण ... They Don't give a fuck . इनको कोई मतलब नहीं की कौन कटा और भईया कौन मरा और किसको क्या जरुरत है , इनको बस इतना पता है की इनको फायदा होना चाहीए । आम तौर पर इनका काम होता है एक से ज्यादा राज्यों के बीच में तो राजा भी इनका चाटते हैं और ऐ भी राजा का .. कौन किसकी चाटेगा Depends upon Size of Business .
पुरानी व्यवस्था की शुरुआत भी सम्मान के आधार पर हुई थी जो बाद में थोपी जाने लगी , आज भी इसकी निंव सम्मान के आधार पर रखी जा रही है ।
इस व्यवस्था के शिर्ष पर हैं कुछ Lobbyist , Bureaucrats और मीड़िया घराने या मीडिया मुगल , यह पुरानी जाती सभ्यता के ब्राहमण माने जा सकते हैं । यह सत्ता में पुर्ण हस्तक्षेप करते हुए भी निरंतर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं की यह सिर्फ सलाह मात्र देते हैं और बस सत्ता को सही मार्ग दिखाते हैं । इनकी शक्ती का आधार भी इनका ज्ञान है और यह भी इसमें सक्षम हैं की स्थीती चाहे कुछ भी हो यह अपना महत्व बनाए रखते हैं ।
आपके पास इनके कारनामों के कितने भी प्रमाण हो यह वर्ग बचकर निकलना जानता है , य वर्ग सबसे ज्यादा शक्तीशाली है और सम्मान प्राप्त करता है , यह हैं मतलब एकदम स्टड़ टायप वाले इनके पता है की कैसे हमला करना है की " साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टुटे " ।
दुसरे स्तर पर हैं राजनीतिक नेता , सेना और किसान । देखिए जो क्षत्रीय होते थे पुराने जमाने में वो भी दो टायप के होते थे - एक जो सच में शासन करता था और नीति वाला काम करता था और दुसरा वाला लेवल था भौकाली क्षत्रीय , मतलब की शार्ट में ऐसे समझ लीजिए की ऐ लोग क्षत्रीय वाला पुरा शान को ढोते तो थे मगर दरअसल इनको पाला जाता था पहले लेवल वालों के स्वार्थ सिद्धी के लिए । जैसे की देखीए जब कभी जरुरत होती थी की क्षत्रीय गुणों के नुमाईश की तो इनको आगे किया जाता था और इन लोगों के काम से पहले लेवल वालों का गुदा नापा जाता था । जैसे की फलाना राजा के सेना के लड़ाकों ने हजारों को काट ड़ाला या फलाना राजा के जागीरदारों ने करोंड़ों का लगान जमा किया ... तो काम किया कौन ? Second level .... और स्टड़ बनके नाम कमाया कौन ? First level ............
अब तीसरे स्तर पर होते थे - वैश्य । इस वाले स्तर पर आज भी सबसे कम बदलाव आया है यह कल भी व्यपार करते थे और आज भी करते हैं । कौन राजा है , कौन ब्राहमण ... They Don't give a fuck . इनको कोई मतलब नहीं की कौन कटा और भईया कौन मरा और किसको क्या जरुरत है , इनको बस इतना पता है की इनको फायदा होना चाहीए । आम तौर पर इनका काम होता है एक से ज्यादा राज्यों के बीच में तो राजा भी इनका चाटते हैं और ऐ भी राजा का .. कौन किसकी चाटेगा Depends upon Size of Business .
चौथे स्तर पर और सबसे निचले स्तर पर आते हैं - नौकरी करने वाले समान्य स्तर के लोग । इनको मतलब भईया सबसे हैं यह बातें सबकी करेंगे मगर उखाड़ ना कल कुछ पाए थे ना आज पाएंगे । जब कभी भी उपर के तीनों वर्गों में से किसी में टकराव होगा या उनका मुड़ खराब होगा तो भुगतना इनको पड़ेगा , संख्या सबसे ज्यादा इनकी है और साथ ही काम भी सबको इनसे ही करवाना है इसलीए .. कभी कभी मालीक इनको रोटी ड़ाल जाता है और ऐ इससे खुश हैं और तबतक खुश रहेंगे तबतक आवाज नहीं उठाएंगे जबतक जान पर ना बन आए ।
इनको कुछ लेना देना नहीं है किसी से बस दो बोतल , एक घर और एक मेहरारु चाहीए बाकी सब देखा जाएगा ।
अब मैं गलत कह रहा या सही थोड़े देर के लिए इस सोच में ना पड़कर यह सोचिए की आप इससे प्रभावीत हैं की नहीं ? आपको भी नए वाले आर्ड़र में चलने की आदत लग रही है की नहीं ?
अब आपपर निर्भर करता है इस जाती व्यवस्था के आप गुलाम बनेंगे या इसके सर उठाने से पहले , इसके व्यस्क होने से पहले इसका सर कुचल देंगे ।
