Friday, 29 April 2016

मैं हुँ ही सवाली - बाबा साहब अंबेडकर - I

जब विश्व प्रथम विश्व युद्ध की चपेट में था । लाला लाजपत राय उस समय अमेरीका में थे जब आंबेडकर अपना अध्धयन कर रहे थे । श्री 'एडविन ' लाजपतराय के घनिष्ट मित्र थे , वे प्रोफेसर थे । आंबेडकर उन्हें अच्छी तरह जानते थे । ब्रिटिश खुफिया विभाग के अफसरों का ख्याल था कि आंबेडकर "भारतीय क्रांती दल " के सदस्य हैं । प्रोफेसर एडविन को भारतीय राजनीतिक दल से जोडने की पेशकश कर चुके थे , किन्तु आंबेड़कर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था "वह विधार्थी हैं और उनको महाराजा बड़ौदा को दिए गए वचन के अनुसार पूरा ध्यान अघ्धयन पर केंद्रीत करना है , क्योंकी उन्हें ऐसा स्वर्ण अवसर प्रदान किया है जिसे वो किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं ( राष्ट्र की किमत पर भी नहीं )" ।। 1 &  2
कहते हैं

।। होनहार बान के होत चिकने पात ।।

आंबेडकर के चिकने पात भी हमें उनके छात्र जिवन से ही मिलने लगते है । जब राष्ट्र अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा था और एक बालक का भी रक्त उबाल मार रहा था की वह राष्ट्र के लिए जान दे दे , तब भारत के एक महान "पुत्र" को राष्ट्र की नहीं अपने अध्धयन की चिंता खाए जा रही थी ।

मैं अब तक नहीं समझ पाया की विदेशों में ऐसी कौन सी पढ़ाई उस वक्त करवाई जाती थी जो की लोगों को जनता से जुड़ना सिखाती थी । क्युँकी हमारे सारे राष्ट्र निर्माताओं का सृजनकर्ता कोइ और रही विदेशी संस्थान रही है । नेहरु , गाँधी , आंबेडकर आदी अधिकतर नेताओं को भारतीय जनता के दर्द का एहसास विदेशों में सैंपेन की ग्लास खनकाते हुए हुआ । भारतियों के भुखे पेट का एहसास उन्हें तब हुआ जब वो अपने माशुकाओं के साथ मखमली बिस्तरों मे लेटे हुए थे ।
राजेश नायक जी के सलाह पर मैनें आंबेडकर को पढ़ने , अथवा गंभीरता से पढ़ने की शुरुआत की । आज जब मैनें आंबेड़कर से जुड़े कुछ साहित्य को पढ़ लिया तो कुछ सवाल मेरे मन में आए जिनका जवाब कोई भी ग्रंथ मुझे नहीं पाया । मैं किसी का विरोधी नहीं हुँ बस कुछ सवाल हैं जो मन में उठते हैं । आपसे निवेदन है की बिना किसी पुर्वाग्रह से ग्रसीत हुए मेरे सवालों को पढ़ें एवं अगर सँभव हो तो मेरी शँकाओ का समाधान करें ।

पुरे समय के दौरान मुझे एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिला जिसमें राष्ट्र को अँग्रेजों के पाष से मुक्त कराने के किसी संघर्ष में आंबेडकर ने प्रत्यक्ष भुमिका निभाई हो या गरीब किसानों के या मजदुरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई हो । उनका संपुर्ण संघर्ष एक कमरे में सीमित था जहाँ बैठकर आप समाजिक इंजीनियरिंग का खाका तैयार किया करते थे । अत:  आंबेडकर का स्वतंत्रता अथवा समानता संग्राम केवल विचारों तक में सीमित था , अब अगर केवल विचारों से कोई मसिहा माना जा सकता है तो "राहुल गाँधी के विचार कौन से बुरे हैं ?"
आज अगर कोई व्यक्ती स्वतंत्रता सेनानी है तो उसका सत्यापन और पेंशन भी इसी आधार पर होता है की उसने कितना समय अंग्रेजी शासन के दौरान जेल मे बिताया क्योंकी अंग्रेजों के मुताबीक किसी भी स्वतंत्रता सेनानी की असल जगह जेल में होती थी । इस आधार को मान के चलने पर तो आंबेडकर साहब स्वत्रंता सेनानी भी नहीं थे , क्युँकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबा साहब की एक भी रात जेल में नहीं कटी । तो फीर किस आधार पर उनके स्वतंत्रता सेनानी होने का दंभ भरा जाता है ? जबकी वह तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के भी अधीकारी नहीं हैं ।

सन् 1931 जब पुरा देश कराह रहा था हर तरफ से उत्पिडन की खबरें आ रही थी , माँ बहनों की अस्मत खतरे में थी । वह ऐसा दौर था जव एक आम भारतवासी साँस लेने से भी पहले भारत के आजाद होने का सोचता था तब बाबा को गोलमेज सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधीत्व का अवसर मिला मगर वहाँ आजादी के लिए मुखर तौर पर आवाज उठाने के बजाय , आप गोलमेज सम्मेलन में भारत की बुराई करने में लगे थे और आपको भारत के लिए स्वतंत्रता नहीं बल्की  " आरक्षण " चाहीए था । अब अगर एक अंतराष्ट्रिय सम्मेलन में जाकर अपने मातृभुमी को कोसना , अवगुन गिनाना गलत नहीं है , तो आजम खान ने UN को चिट्ठी लिखकर क्या गलत किया ?  

हिँदु समाज को सुधारने का ठेका लेकर आपने "हिँदु कोड बिल" का रोना रोया और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ -मनुस्मृती को जलाया- । हिँदु कोड़ बिल में सबसे महत्वपुर्ण बात दो शादियों के प्रचलन को रोकना था , मगर अचरज की बात है की सन् 1948 में जब आपकी उम्र 55 वर्ष थी तो आपने शारदा कबीर नाम के ब्राहमन महिला से 15 अप्रैल 1948 को दुसरा विवाह कर लीया । जिनका नाम उसके पश्चात बदलकर सविता आंबेडकर कर दिया गया ।
तो क्या ।।हाथी के दाँत खाने को कुछ और दिखाने को कुछ और ।।

ऐसे और दर्जनों प्रसंग हैं जिनका वर्णन अगली कड़ी में करुँगा तब तक आपसे विनम्र निवेदन है की इस बाल मन की शंका को दुर करें और मुझे बताँए की मैं क्यों आंबेडकर को सम्मान दुँ ।।

मैं क्युँ उनपर आरोप ना लगाउँ ?



1. डा. राजेन्द्र मोहन भ़टनागर           डा. आंबेडकर जिवन और दर्शन --- पृष्ट  10 - 34
2. डा. जी. पी . काशिव               डा. आंबेडकर के विचार    --- पृष्ट  80 - 95


Tuesday, 5 April 2016

अँधा इतिहास : अँधे हम

आज जब हम भारतीय इतिहास की या स्वतंत्रता के 10-20 वर्षों के बाद के भारत की करते हैं तो जिन दस्तावेजों का या जिन किताबों का हम उद्धरण हम लेते हैं वो उस वक्त को अपने हिसाब से ढालने वाले एकमात्र सगंठन कांग्रेस और उस विचारधारा से सबंधीत लोगों सो संबदीत होती है । भारत का संपुर्ण इतीहास माना जाने वाला भारत की खोज भी हमारे सम्मानीय प्रथम प्रधानमंत्री महोदय जवाहर लाल नेहरु के द्वारा लिखा गया है । मेरे एक मित्र के द्वारा दिया गया तर्क याद आता है की " क्या आपने कभी किसी पुलिस थाने में जाकर खुद के खिलाफ़ कोई शिकायत लिखवाई है , की आज मैं बिना हेलमेट के गाड़ी चला रहा था ?"
जब आपको इस बात का ज्ञान हो की आपके द्वारा लिखा जा रहा दस्तावेज भवीष्य में आपके ही महानता की वर्णन गाथा बनेगी तो मैं कैसे मान लुँ की खुद को श्रेष्ट सिद्ध करने के लिए आपने उसमें अपनी सहुलियत के हिसाब से छेड़खानी नहीं की होगी ।
मैं हमेशा से मानता रहा हुँ की भारत का जो संपुर्ण इतिहास हम पढ़ते आए हैं वो विभत्स है अधुरा है । इतीहास को पढ़ते वक्त हम उस हाथ में लाठी लिए अँथे पुरुष की भाँती होते हैं जो खुद कुछ नहीं देख सकता , उसे अपने आस पास के सारे वातावरण का अंदेशा उस व्यक्ती के हिसाब से लगाना पड़ता है जो हाथ पकड़ कर उसे रास्ता दिखा रहा है । इतीहास का अध्यन करते वक्त हम भी अँधे हो जाते हैं एवं बस इतिहासकार की उँगली पकड़कर अपना फैसला सुना देते हैं ।।
आज अगर कोइ ऐसा व्यक्ती जो मुझसे बहुत प्रभावीत है मेरे विषय में एक पुस्तक लिखकर मेरे गुणों का बखान करता है, और वह पुस्तक सैकड़ों सालों के बाद किसी के द्वारा पढ़ा जाता है तो मैं निश्चित तौर पर उस व्यक्ती के लिए मर्यादा एवं आदर्शों की मुर्ती बन जाउँगा जबकी वास्तविकता उसके बिल्कुल उलट क्युं ना हो , ठीक इसी तरह मेरे विरोधी के द्वारा लिखी गई एक किताब भविष्य की निगाहों में मुझे दानव सिद्ध कर सकती है ।
आज जिन नेताओं को हम भारत का युगनिर्माता मानते हैं उनको आदर्श सिद्ध करने वाली अधीकतर रचनाँए उस काल की हैं जब वो सत्ता में अथवा शक्ती के केन्द्र में थे । आज कोइ यह सवाल नहीं पुछता की किन सबुतों के आधार पर विर सावरकर को गाँधी हत्या में दोषी सिद्ध किया गया है ।
कोई नहीं पुछता की कैसे गाँधी हत्या का सहआरोपी रहा दिगम्बर बड़गे जो सरकारी गवाह बनकर गोड़से बँधुओं तथा विर सावरकर के ताबुत की कील बना वो मात्र चँद सालों में रिहा हो जाता है और उसके बाद किस आधार पर भारतीय पुलिस में नियुक्त कर लिया जाता है ।
कोई नहीं पुछता की सरकारी गवाह बना आरोपी मदन लाल पहवा, छुटने के बाद कैसे इतनी समपत्ती जुटा लेता है की बम्बई जैसे शहर में कागज़ की मिलें खरीद लेता है ।
कोई पुस्तक इस बात का विवरण क्यों नहीं देती की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक कहे जाने वाले मोहन दास करमचँद गाँधी को क्यों सँविधान सभा में जगह नहीं दी जाती और स्वतंत्रता संग्राम में शुन्य योगदान रखने वाले भिमराव अँबेड़कर को सिर्फ जातीगत राजनिति के नाम पर संवीधान सभा का सर्वोपरी बना दिया जाता है ?
आजादी के बाद सालों तक भारत में सिर्फ एक पार्टी , सिर्फ एक विचारधारा राज करती रही और सालों के इस बेरोकटोक शासन के दौरान जब विपक्ष नदारद था उन्होनें भारत के इतिहास के अस्मिता के रौंद डाला और योजनाबद्ध तरिके से अपने विरोधियों को खलनायक साबित करने का हर वो सँभव प्रयास किया जिससे की उनका कोइ विरोधी ना पनप पाए और वो एकछत्र राज करते रहें ।

भारतीय इतीहास का समय समय पर विदेशियों तथा अपने हीं नेताओं के द्वारा बलात्कार होता रहा है इसलीय हमारा कर्तव्य है की हम इतिहास को पढ़ते वक्त आँखो के साथ दिमाग भी खुला रखें एवं परदे के पिछे डाल दिए गए तथ्यों पर सवाल उठाँए ।।

Friday, 1 April 2016

कुछ बेरंग रंग

                    इस जमाने में झूठ आखिर कब तक बिकता है,
                   कितना भी पक्का हो रंग एक दिन उतरता है ।।
                   
रंग रंग और रंग हर तरफ कुछ है तो सिर्फ रंग । होली के बाद चढ़ा रंग तो खैर फिर भी कुछ दिनों में उतर जाएगा , अब हाथों में चढ़ा गाढ़ा हरा रंग हल्का पड़ने लगा है , लोग फिर से बेरंग होने लगे हैं । पहले होली से मैं भी डरता था , रंगो से डर था एक खौफ कि कहीं इन बनावटी रंगो में अपना असली रंग ना खो दूँ । ऐसा बिल्कुल नही है की अच्छा रंग था मेरा कोइ खास न तब था न अब है लेकिन जो भी हो वो मेरा रंग था और अपने से प्रेम तो होता हीं है । अक्सर होली के दिन दरवाजे बंद करके छुप जाता था , अपने ही घर में खुद को नज़रबंद कर लेता था ताकि कोई अपने रंग में ना रंग दे ।
आज जब दुनिया को देखना शुरु किया है , जब ऐसे स्थान पर आया जहाँ की वैचारिक स्वतंत्रता मिली है । पंख फैलाने का मौका अब मिला तो क्या देखता हुँ की हर तरफ रंग फैला है , हर किसी ने खुद को रंग रखा है और अपना असली रंग कहीं छुपा दिया है । बचपन की कहानियों में जब कोइ अपनी जान तोते में छुपाता था तो पुरी रात में यही सोचने में निकाल देता था की भला इन्सान अपनी जान तोते में क्यों छिपाए तोते को मारना तो इन्सान को मारने से ज्यादा आसान है , अब अगर छुपाना इतना ही आसान है तो अपनी जान किसी कछुए, हाथी या शेर में छुपाओ की मारने वाला भी हजार बार सोचे । अब समझ रहा हुँ की दरअसल तोते में अपने जान को छुपाने की एक अलग वजह थी , जब अपनी चीज किसी को छुपाने के लिए देनी हो तो हमेशा कमजोर को देना चाहीए क्या पता कहीं ताकतवर को दे दिया और उसने वापस करने से मना कर दिया तो । जिन्होनें अपना रंग छुपाया है वो भी बड़े चतुर हैं वो जानते हैं की अपना रंग अपने पास रखने में बड़ा खतरा है , कहीं किसी ने अपना रंग उन पर दिखाना शुरु किया तो वो बेरंग हो जाँएगे । अब जैसे ही वो बेरंग होने लगते हैं कहीं से दूसरा रंग चढ़ा लेते हैं और कहते हैं की वो तो मेरा रंग था है नहीं , इससे रंग भी बच जाता है और वो रंगने से भी बच जाते हैं ।

इन रंगे हुए चेहरों को पहचानने के लिए कोइ तरीका मैं तो अब तक नही सोच पाया , ऐ रंगे हुए चेहरे खुबसुरत तो लगते हैं लेकीन इन बदलते रंगो के बनावटीपन को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता । कुछ लोगों के शौक इससे भी अजीब हैं वो खुद को तो इन रंगो में रंगे रहते हैं मगर कोशिश होती है की वैचारीक होली खेलते हुए सबको किसी न किसी रंग में रंग दें , साफ चेहरे इनसे बर्दाश्त नहीं होते । मैं अब होली में गुलाल खेल लेता हुँ लेकिन इस वैचारिक होली से आज भी डरता हुँ, अपना रंग मुझे बहुत प्यारा है । 


editor in charge : upasna :D धन्यवाद :)