आदरणीय रविश जी एवं रोहित जी
नमस्कार
कल से आपके पत्रों की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ , माफ़ी चाहता हूँ इस गुस्ताखी के लिए लेकिन आपको पढ़ कर सुन कर हमेशा प्रेरित होता रहा हूँ तो इस बार भी खुद को रोक नहीं पाया ।
मैं किसी चैनल का एंकर नहीं हूँ न ही मेरे किसी रिश्तेदार को राज्यसभा की सदस्यता , निरपेक्षता ही हद समझ लीजिये की अब तक सरकार ने वोट का अधिकार भी नहीं दिया है । अभी पिछले ही साल पत्रकारिता की पढाई करने आया हूँ । साइन्स से बारहवी करने के बाद घर वालों को इसके लिए मना पाना आसान नहीं था , बहुत से सवाल थे और जिद भी करनी पड़ी और अंत में जाकर साथ में competiton की तैयारी भी करता रहूँगा इस नसीहत के साथ आने की इजाजत मिली ।
जब विश्वविद्यालय में कदम रखा तो बड़ा खुश था और हौसला कुछ ज्यादा ही मजबूत लेकिन जब पहली ही क्लास में इंट्रोडक्शन के दौरान पूछा गया की पत्रकारिता क्यों करना चाहते हो तो कुछ का जवाब था ग्लैमर , टीवी पर दिखना और कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला था की कहीं और admisson नहीं मिला इसलिए ( ओ 5-6 लाख नहीं देते हैं , 60 हज़ार वाले कूड़े का ढ़ेर हैं ) लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी क्यूंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।
कुछ ही फिन बीते होंगे की सीनियर्स के साथ उठना बैठना सुरु हुआ तो पता चला की ओ पत्रकारों को मीडिया मजदुर कहते हैं और जहाँ मैं 15-20 समझ रहा था 7 हज़ार की नौकरी मिलती है । एक को पढ़ा की अगर पत्रकार बनना है तो सर्विस वाली लड़की से शादी करना , अभी एक बैच आँखों के सामने से पास आउट हुआ उनमे से एक ने लिखा की पत्रकारों के भूखे मरने की नौबत आ रही है ( सबकी लेखनी फेसबुक पर हुई थी ) लेकिन मेरा हौसला बना रहा क्योंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।
एक कदम आगे बढ़कर इंटर्न ज्वाइन किया तो उन्होंने सलाह दी की जो 60 हज़ार यहाँ विश्वविद्यालय में दोगे उसकी जगह ठेला लगालो ज्यादा फायदे में रहोगे । पहले ही दिन एक प्रोफेसर सर ने कहा था की " दुःख होता है जब तुम जैसे लोग हर साल जिंदगी ख़राब करने आते हैं " लेकिन मेरा हौसला बना रहा था ।
मुझे तो दो दिन हुए हैं लेकिन माँ बाप को लगता है बेटा पत्रकार बन गया है , जब कहीं किसी पत्रकार पर हमले की या मौत की खबर आती है तो रात भर फ़ोन आते रहते हैं , कभी कभी तो मुझे भी सपने आने लगते हैं लेकिन हौसला नहीं हारा ।
आपको पढ़ा तो लग रहा है ये कैसा पेशा है शिर्ष पर होने के बावजूद दो लोग अपनी मानसिक पीड़ा में पत्रकारिता को भूल गए , नयी पीढ़ी को हौसला देने के बजाये रविश कुमार ने हमें एम . जे . अकबर बन ने की सिख दी ( उन्ही एम जे अकबर को पत्रकारिता का बिचौलिया भी कहा है ) , आपने पत्रकारिता कर रहे लोगों को हौसला देने की जगह उन्हें कूड़े का ढेर कहा और हमारे रोहित जी को भी समस्या इस बात से नहीं की बात क्या है उन्हें अपना राष्ट्रवाद दिखाना है । अब सोच रहा हूँ पापा को फ़ोन कर ही दूँ की मई घर आ रहा हूँ , क्योंकि मैं ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आया था ।
मैंने कहा की ये तो कस्तूरी और हिरन की जैसी लड़ाई है , अपने ही नाभि के सुगंध को ढूंढने में ये प्राण दे रहे हैं , ये अपनी आपसी टकराव में पेशे को बदनाम कर रहे हैं लेकिन बाद में बताया की नहीं ये स्वहित की नहीं विचारधारा की लड़ाई है ।
मैं नहीं जानता ये किसकी लड़ाई है लेकिन दाव पर पत्रकारिता लगी है , आपके पुर्वजों ने आपके हाथों में पत्रकारिता को एक हथियार बना कर दिया था ताकि आप कमजोरों की लड़ाई लडें अब देखना है की आप हमारे हाथों में पत्रकारिता को क्या बना कर देते हैं ।
आपकी अगली पीढ़ी ।
नमस्कार
कल से आपके पत्रों की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ , माफ़ी चाहता हूँ इस गुस्ताखी के लिए लेकिन आपको पढ़ कर सुन कर हमेशा प्रेरित होता रहा हूँ तो इस बार भी खुद को रोक नहीं पाया ।
मैं किसी चैनल का एंकर नहीं हूँ न ही मेरे किसी रिश्तेदार को राज्यसभा की सदस्यता , निरपेक्षता ही हद समझ लीजिये की अब तक सरकार ने वोट का अधिकार भी नहीं दिया है । अभी पिछले ही साल पत्रकारिता की पढाई करने आया हूँ । साइन्स से बारहवी करने के बाद घर वालों को इसके लिए मना पाना आसान नहीं था , बहुत से सवाल थे और जिद भी करनी पड़ी और अंत में जाकर साथ में competiton की तैयारी भी करता रहूँगा इस नसीहत के साथ आने की इजाजत मिली ।
जब विश्वविद्यालय में कदम रखा तो बड़ा खुश था और हौसला कुछ ज्यादा ही मजबूत लेकिन जब पहली ही क्लास में इंट्रोडक्शन के दौरान पूछा गया की पत्रकारिता क्यों करना चाहते हो तो कुछ का जवाब था ग्लैमर , टीवी पर दिखना और कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला था की कहीं और admisson नहीं मिला इसलिए ( ओ 5-6 लाख नहीं देते हैं , 60 हज़ार वाले कूड़े का ढ़ेर हैं ) लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी क्यूंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।
कुछ ही फिन बीते होंगे की सीनियर्स के साथ उठना बैठना सुरु हुआ तो पता चला की ओ पत्रकारों को मीडिया मजदुर कहते हैं और जहाँ मैं 15-20 समझ रहा था 7 हज़ार की नौकरी मिलती है । एक को पढ़ा की अगर पत्रकार बनना है तो सर्विस वाली लड़की से शादी करना , अभी एक बैच आँखों के सामने से पास आउट हुआ उनमे से एक ने लिखा की पत्रकारों के भूखे मरने की नौबत आ रही है ( सबकी लेखनी फेसबुक पर हुई थी ) लेकिन मेरा हौसला बना रहा क्योंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।
एक कदम आगे बढ़कर इंटर्न ज्वाइन किया तो उन्होंने सलाह दी की जो 60 हज़ार यहाँ विश्वविद्यालय में दोगे उसकी जगह ठेला लगालो ज्यादा फायदे में रहोगे । पहले ही दिन एक प्रोफेसर सर ने कहा था की " दुःख होता है जब तुम जैसे लोग हर साल जिंदगी ख़राब करने आते हैं " लेकिन मेरा हौसला बना रहा था ।
मुझे तो दो दिन हुए हैं लेकिन माँ बाप को लगता है बेटा पत्रकार बन गया है , जब कहीं किसी पत्रकार पर हमले की या मौत की खबर आती है तो रात भर फ़ोन आते रहते हैं , कभी कभी तो मुझे भी सपने आने लगते हैं लेकिन हौसला नहीं हारा ।
आपको पढ़ा तो लग रहा है ये कैसा पेशा है शिर्ष पर होने के बावजूद दो लोग अपनी मानसिक पीड़ा में पत्रकारिता को भूल गए , नयी पीढ़ी को हौसला देने के बजाये रविश कुमार ने हमें एम . जे . अकबर बन ने की सिख दी ( उन्ही एम जे अकबर को पत्रकारिता का बिचौलिया भी कहा है ) , आपने पत्रकारिता कर रहे लोगों को हौसला देने की जगह उन्हें कूड़े का ढेर कहा और हमारे रोहित जी को भी समस्या इस बात से नहीं की बात क्या है उन्हें अपना राष्ट्रवाद दिखाना है । अब सोच रहा हूँ पापा को फ़ोन कर ही दूँ की मई घर आ रहा हूँ , क्योंकि मैं ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आया था ।
मैंने कहा की ये तो कस्तूरी और हिरन की जैसी लड़ाई है , अपने ही नाभि के सुगंध को ढूंढने में ये प्राण दे रहे हैं , ये अपनी आपसी टकराव में पेशे को बदनाम कर रहे हैं लेकिन बाद में बताया की नहीं ये स्वहित की नहीं विचारधारा की लड़ाई है ।
मैं नहीं जानता ये किसकी लड़ाई है लेकिन दाव पर पत्रकारिता लगी है , आपके पुर्वजों ने आपके हाथों में पत्रकारिता को एक हथियार बना कर दिया था ताकि आप कमजोरों की लड़ाई लडें अब देखना है की आप हमारे हाथों में पत्रकारिता को क्या बना कर देते हैं ।
आपकी अगली पीढ़ी ।