Monday, 14 October 2019

गरीबी से लड़ने के वैज्ञानिक प्रयासों को नोबेल का सम्मान



सोमवार की शाम पूरा देश एक साथ सोशल मीडिया पर अभिजीत बनर्जी को बधाई देने के लिए उमड़ पड़ा। अभिजीत बनर्जी को इस वर्ष ' वैश्विक गरीबी को कम करने के लिए प्रायोगिक दृष्टिकोण' के लिए एस्थर दुफ्लो एवं माइकल क्रेमर के साथ संयुक्त रूप से अर्थशास्त्र के नोबेल से सम्मानित किया गया है। एस्थर और अभिजीत छठे विवाहित दंपत्ति हैं जिन्हें संयुक्त रूप से नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

अभिजीत मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में अर्थशास्त्र के फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल प्रोफेसर हैं और उनका काम विकास अर्थशास्त्र पर केंद्रित है। एस्तेर डफ़्लो, माइकल क्रेमर, जॉन ए लिस्ट और सेंथिल मुलैनाथन के साथ मिलकर अभिजीत ने अर्थशास्त्र में कैजुअल रिलेशनशिप की खोज के लिए एक महत्वपूर्ण पद्धति के रूप में फील्ड एक्सपेरिमेंट्स का प्रस्ताव दिया है।

वर्ल्ड बैंक के वाशिंगटन मुख्यालय के बाहर एक पत्थर लगाकर बैंक का मिशन उसपर दर्ज किया गया है, इस पत्थर पर लिखा है 'गरीबी से मुक्त विश्व हमारा सपना है'। विकासशील एवं विकसित देशों ने गरीबी उन्मुलन को अपनी प्राथमिकताओं में रखा है और यही कारण है कि 1990 में जहाँ विश्व की 36% आबादी रोजाना 1.9 अमेरिकी डॉलर से कम में अपना जीवन बसर कर रही थी वहीं 2013 में यह आंकड़ा 11% और 2015 में केवल 10% रह गया है। वैश्विक कारोबार एवं अंतरराष्ट्रीय प्रयासों ने लगातार लोगों के जीवनस्तर को सुधारा है लेकिन यह प्रयास सब सहारा अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में कारगर सिद्ध होते नहीं दिख रहे। वर्ल्ड बैंक के आंकड़ों के मुताबिक अगर स्थितियों में बदलाव नहीं आये तो 2025 तक गरीबी रेखा के नीचे जीवन बसर करने वाले विश्व के 10 में से 9 लोग सब सहारा अफ्रीका से होंगे। 

यह आँकड़े हमें बताते हैं कि गरीबी उन्मुलन के इतने प्रयासों के बावजूद हमसे कुछ कमियां रह गयी हैं और इन्हीं कमियों को दूर करने का प्रयास अभिजीत सालों से कर रहे हैं। अभिजीत अब्दुल लतीफ जमील पॉवर्टी एक्शन लैब के सह-संस्थापक हैं जिसमें वह अर्थशास्त्री एस्तेर डुफ्लो और सेंथिल मुलैनाथन के साथ मिलकर गरीबी उन्मुलन के इन प्रयासों को वैज्ञानिक एवं परियोजनामुलक बनाना चाहते हैं। 

2006 में प्रकाशित अभिजीत की किताब 'अंडरस्टैंडिंग पॉवर्टी' गरीबी के अर्थशास्त्र को समझने एवं गरीबी उन्मुलन के प्रयासों को सुनियोजित एवं वैज्ञानिक बनाने के तरीकों के लिए एक रूपरेखा प्रस्तुत करती है। 2011 में अभिजीत ने एस्थर के साथ मिलकर एक पुस्तक ' पुअर इकोनॉमिक्स - ए रैडिकल रीथिनकिंग ऑफ द वे टू फाइट ग्लोबल पॉवर्टी' प्रकाशित की जो की इस विषय पर विस्तृत एवं अध्यानात्मक विवेचना प्रस्तुत करती है। इस पुस्तक को विश्व भर के अर्थशास्त्रियों एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने भी सराहा।

अभिजीत का प्रेसीडेंसी कॉलेज कोलकाता और जेएनयू दिल्ली से नोबेल का यह सफर सफलता की कहानी तो है हीं साथ ही एक प्रयास है उस दुनिया को और बेहतर बनाने का जिसमें हम रह रहे हैं।

Thursday, 22 June 2017

नई पैकिंग में पुराना जातिवाद ।

जाति समाजीक नहीं अपितु एक मानसीक स्थीती है , हमेशा जाति की परिभाषा को बदलने में ,उससे उभरने में लगे रहते हैं लेकिन तबतक जाती अपना रुप बदल कर हमारे बीच आ जाती है हम शनै शनै उसे स्वीकार करने लग जाते हैं ।जब सबसे पहले जाती व्यवस्था की निंव रखी गई तब यह कर्म आधारीत था और कर्म के आधार पर व्यवहार था मगर फीर जन्म आधारीत हो गया।आज जब हम खुशीयाँ मना रहे हैं या कहुँ की इस जाती की बेड़ी से आजाद होने में लगे हैं , तब पता नहीं क्यों मैं एक नई तरह की जाती व्यवस्था को उभरता देख रहा हुँ , यह भी कर्म आधारीत है और पुरानी व्यवस्था से कहीं ज्यादा रुढ़ ।
पुरानी व्यवस्था की शुरुआत भी सम्मान के आधार पर हुई थी जो बाद में थोपी जाने लगी , आज भी इसकी निंव सम्मान के आधार पर रखी जा रही है । 
इस व्यवस्था के शिर्ष पर हैं कुछ Lobbyist , Bureaucrats और मीड़िया घराने या मीडिया मुगल , यह पुरानी जाती सभ्यता के ब्राहमण माने जा सकते हैं ।  यह सत्ता में पुर्ण हस्तक्षेप करते हुए भी निरंतर यह सिद्ध करने का प्रयास करते हैं की यह सिर्फ सलाह मात्र देते हैं और बस सत्ता को सही मार्ग दिखाते हैं । इनकी शक्ती का आधार भी इनका ज्ञान है और यह भी इसमें सक्षम हैं की स्थीती चाहे कुछ भी हो यह अपना महत्व बनाए रखते हैं । 
आपके पास इनके कारनामों के कितने भी प्रमाण हो यह वर्ग बचकर निकलना जानता है , य वर्ग सबसे ज्यादा शक्तीशाली है और सम्मान प्राप्त करता है , यह हैं मतलब एकदम स्टड़ टायप वाले इनके पता है की कैसे हमला करना है की " साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टुटे " 

दुसरे स्तर पर हैं राजनीतिक नेता , सेना और किसान । देखिए जो क्षत्रीय होते थे पुराने जमाने में वो भी दो टायप के होते थे  - एक जो सच में शासन करता था और नीति वाला काम करता था और दुसरा वाला लेवल था भौकाली क्षत्रीय , मतलब की शार्ट में ऐसे समझ लीजिए की ऐ लोग क्षत्रीय वाला पुरा शान को ढोते तो थे मगर दरअसल इनको पाला जाता था पहले लेवल वालों के स्वार्थ सिद्धी के लिए । जैसे की देखीए जब कभी जरुरत होती थी की क्षत्रीय गुणों के नुमाईश की तो इनको आगे किया जाता था और इन लोगों के काम से पहले लेवल वालों का गुदा नापा जाता था । जैसे की फलाना राजा के सेना के लड़ाकों ने हजारों को काट ड़ाला या फलाना राजा के जागीरदारों ने करोंड़ों का लगान जमा किया ... तो काम किया कौन ? Second level .... और स्टड़ बनके नाम कमाया कौन ? First level ............
अभी के टायम में आप राजनेताओं को पहले लेवल वाला क्षत्रीय और किसान और सेना को दुसरे लेवल वाला समझ लीजिए। मतलब कुल मिला के सब ऐश मौज और ठाठ बाठ़ रहेगा फर्सट लेवल वाले का और जब कभी गुदा साबीत करने की बात आई या कोई हमला हुआ आपके क्षत्रीय अधीकारों पर तो इनको आगे कर दीजिए और फर्सट लेवल सेक्योर , मतलब इन सेकेंड़ लेवल वालों का हाल उन बकरीयों की तरह होता है जिसको खुब अच्छा अच्छा खिला के और सम्मान वम्मान देके भौकाली तो फील करवाया जाता है लेकिन पालने का मकसद बेटा होता है , सिर्फ और सिर्फ लास्ट में बली चढ़ाना ।

अब तीसरे स्तर पर होते थे - वैश्य । इस वाले स्तर पर आज भी सबसे कम बदलाव आया है यह कल भी व्यपार करते थे और आज भी करते हैं । कौन राजा है , कौन ब्राहमण ... They Don't give a fuck . इनको कोई मतलब नहीं की कौन कटा और भईया कौन मरा और किसको क्या जरुरत है , इनको बस इतना पता है की इनको फायदा होना चाहीए । आम तौर पर इनका काम होता है  एक से ज्यादा राज्यों के बीच में तो राजा भी इनका चाटते हैं और ऐ भी राजा का .. कौन किसकी चाटेगा Depends upon Size of Business .



इनके जिंदगी का बस एक ही मकसद है और लोगों को इनसे बस एक ही उम्मीद Revenue . इनको भी कोई खास मतलब वतलब है नहीं सम्मान का लेकिन सामने वाला दुसरे किराने वाले के पास ना चला जाए इसलीए गाँव वालों के लिए इतना अच्छा काम और इतना मिठा जरुर बोलते हैं की गुड़वील बना रहे ।

चौथे स्तर पर और सबसे निचले स्तर पर आते हैं - नौकरी करने वाले समान्य स्तर के लोग । इनको मतलब भईया सबसे हैं यह बातें सबकी करेंगे मगर उखाड़ ना कल कुछ पाए थे ना आज पाएंगे । जब कभी भी उपर के तीनों वर्गों में से किसी में टकराव होगा या उनका मुड़ खराब होगा तो भुगतना इनको पड़ेगा , संख्या सबसे ज्यादा इनकी है और साथ ही काम भी सबको इनसे ही करवाना है इसलीए .. कभी कभी मालीक इनको रोटी ड़ाल जाता है और ऐ इससे खुश हैं और तबतक खुश रहेंगे तबतक आवाज नहीं उठाएंगे जबतक जान पर ना बन आए । 

इनको कुछ लेना देना नहीं है किसी से बस दो बोतल , एक घर और एक मेहरारु चाहीए बाकी सब देखा जाएगा ।

अब मैं गलत कह रहा या सही थोड़े देर के लिए इस सोच में ना पड़कर यह सोचिए की आप इससे प्रभावीत हैं की नहीं आपको भी नए वाले आर्ड़र में चलने की आदत लग रही है की नहीं ?

कल आप उस क्षत्रीय के बारे में इसलीए नहीं आवाज उठाते थे क्योंकी वह खुद को भगवान का बेटा बता देता था और आज क्योंकी कोई और इसको मातृभुमी का रक्षक और अन्नदाता टायप विशेषण दे दिया गया है । ऐसा नहीं है की आप सम्मान मत कीजिए मगर ओवर हमेशा कांड़ कर जाता है " अती सवर्त वज्रयते "

अब आपपर निर्भर करता है इस जाती व्यवस्था के आप गुलाम बनेंगे या इसके सर उठाने से पहले , इसके व्यस्क होने से पहले इसका सर कुचल देंगे ।

Saturday, 10 September 2016

अलग एंगल ...

अभी दो या तीन दिन बीते होंगे की श्वेता के साथ किसी से मिलने गया था , शायद कोई काम था और मेरी हमेशा से परेशानी रही है की कभी मिलने मिलाने में कम्फर्टेबल नहीं हो पाया । तो जब कभी भी कहीं जाता हुँ तब अगर समय से सब ठीक हो जाए तो माशाअल्लाह और ना हो तो निगाहें एक कहानी ढ़ूँढ़ने लगती है और हर बेमतलब की चीज में कारण , कुछ लोगों को यह बाते मजेदार लगती हैं और कुछ को ड़सना लेकिन अब क्या कर सकता हुँ सालों की आदत एकबारगी तो छुटती नहीं है ।
वहाँ बैठा था और इंतजार का सिलसिला बदस्तुर जारी था , करीब 10-15 मिनट हो चुके थे लेकिन तबतक आँखों ने अपना खिलौना ढुँढ लिया , वहाँ कुछ हीं दूर दीवार पर एक Aquarium लगा था जिसमें कुछ मछलियाँ कैद थीं , उनके मुँह लगातार चल रहे थे , लोग कहते हैं की वो इस तरह साँस लेते हैं मगर सच कहूँ तो मैं उनकी गालियाँ सुन सकता था । कुछ ही देर बीता होगा की एक सवाल मन में कौंधा .....

ऐ यहाँ कैद क्यों हैं ?

अब सवाल के साथ जवाब तलाशने की दौड़ में निकल पड़ा , मैं रोज जब अपने कमरे से क्लास के लिए निकलता हुँ तो रास्ते में एक नाला पड़ता है , वहाँ पर भी मछलियाँ हैं । वह गंदी हैं , बदबुदार हैं मगर आजाद हैं , बिल्कुल आजाद .. शायद इनको डब्बाबंद चारा ना मिलता हो मगर वह कैद नहीं की जाती उनका अपना जीवन है जो किसी के आँखों के सुकून भर में सिमट नहीं जाता है ।
तो क्या उन कैद मछलियों का जुर्म सिर्फ इतना है की वह खूबसूरत हैं , क्या उनकी पीठ पर वो सुनहरी धारिया हीं उनकी सलाखें हैं ?

क्या है की विश्व का दिमाग या कहुँ तो इन्सानी दिमाग बड़ा Conservative रहा है और हमने समय के साथ खूबसूरती के मायने तो बदले हैं लेकिन कुछ है जो नहीं बदला तो वह है खूबसूरती के प्रति हमारा व्यवहार , हमारा नज़रिया । सच कहुँ तो हम कितना भी खुद को सांत्वना दे लें लेकिन खूबसूरती हमेशा एक अभिशाप रही है , मैंने बहुत सोचा मगर एक उदाहरण नहीं सोच पाता जब खूबसूरती ने अपना साइड़ इफेक्ट नहीं दिखाया हो ।

आप खुद ही अपने आस पास देखें , अगर एक साधारण लड़की या लड़का किसी मुकाम तक पहुचें तो वह मेहनत होती है लेकिन जरा सी खूबसूरती जुड़ते ही वह मेहनत नहीं रह जाती । ना जाने कितने ही दंगलो के लिए आज भी परोक्ष तौर पर खूबसूरती हीं जिम्मेदार मानी जाती है ,आप विश्वयुद्द से लेकर रामायण महाभारत का उदाहरण ले सकते हैं ।

अब देखिए जो है की ऐसा लिखके आपकी खूबसूरती को DEMORALIZE करने का मेरा कोई इरादा नहीं है , इश्वर आपको सदैव खूबसूरत बनाए रखे ।


जरुरत है बस सोचने की एक बार ।

Friday, 2 September 2016

अंतहीन सफ़र...........

आज जब आँखें खुलीं तो उनमें एक अजीब सी चमक थी , वह ना चाहकर भी बार बार मुस्कुरा रही थी । काम तो वही था रोज की तरह लेकिन उस काम में भी एक लय एक अजीब सी थिरक थी आज ।
जब उस आधे शिशे के सामने खड़ी हुई तो खुद को लगातार निहारे जा रही थी एक सम्मोहन का शिकार होती जा रही थी , करीब 5 साल हो गए जब वह इस शिशे को उस मोटी बुड्ढी के बरामदे से उठा कर लाई थी , अपने दोस्तों को उस रोज की कहानी सुनाकर अक्सर मिनी अपने दोस्तों के साथ ठहाके लगाया करती थी , किस्सा था ही मजेदार , सब कितना डरते थे उससे मगर उस दिन मिनी ने उसके दात खट्टे कर दीए थे , कितना तेज भागी थी वो उस शीशे को लेकर , बुढ़िया तो 5 मिनट में हाफ़ने लगी थी ।
आज मगर उसके होठों पर हँसी नहीं मुस्कुराहट थी , पिछले पाँच सालों में पहली बार वह खुद को इतने प्यार से , इतने बारीकी से देख रही थी ।
उसके चमकते ललाट पर बार बार उसके काले बाल जो अब कुछ हद तक भुरे दिखने लगे थे , अटखेलीयाँ कर रहे थे , नाक मानों उन इन दो बड़ी ब़ड़ी आँखो के बीच से सर्रर से किसी खुबसुरत से ढ़लान के जैसी लग रही थी , होंठ तो मानों मुस्कुराते मुस्कुराते थक सी गई थी मगर गालों के बीच की लाली इन सब से अलग अपनी ही कहानी कह रहे थे और इन सब को समेटे एक प्यारा सा चेहरा जैसे किसी कलाकार की सबसे अव्वल रचना हो , मगर उसके उन बालों को हटाने के लिए जब उसने हाथ बढ़ाए तो वेग से बह रही उस अनंत ख्यालों की रेल को एक ब्रेक सा लग गया ।
कितने काले पड़ गए हैं हाथ उसके , जगह जगह से स्याह पड़ गए हैं , मंजु चाची भी अक्सर कहा करती है, अभी मिनी के 2 महिने पहले ही तो 18 साल हुए हैं लेकिन हाथ जैसे किसी अम्मा के हों । अब रोज न जाने वह हाथ कितने ही कच़डे की पेटियों को तलासते हैं वह नरम कैसे होंगे , लेकिन बस अब वह अपना पुरा ख्याल रखेगी , फ़ैसला कर लिया था मिनी ने एक वक्त खाना ना खाएगी तो कोई बात नहीं मगर आज आते वक्त साबुन लेकर आएगी , अब राख से हाथ साफ़ नहीं करेगी वो ।
जब से होश सँभाला मिनी ने खुद को शहर के कोने में बसी बस्ती में ही पाया है , ना कभी अपने अब्बा को देखा ना किसी रिश्तेदार को लेकिन माँ की शक्ल उसे कुछ कुछ याद है । एक दिन अम्मा काम पर गईं थी मगर वापस नहीं आई , गाँव वालों ने ना जाने कितनी ही बातें कहीं मगर मिनी ने हौसला नहीं हारा , दो दो दिन तक भूखी रही लेकिन कभी किसी और से नहीं माँगा । काम की बड़ी पक्की है वो पुरी बस्ती तारीफ़ करता है उसकी , दिन भर मेहनत कर लेती है और अब तो पैसे भी बचा लेती है , पिछले सप्ताह पुरे 50 रुपए बचाए थे और मेले में भी गई थी ।
अब लेकिन काम नहीं करेगी मिनी बिल्कुल भी नहीं , आज वह सागर से मिलने जा रही है । मुश्किल से महीने भर पहले तो मिली है वो लेकिन लगने लगा है की साल बीत गए हैं , वह उसकी तरह काम नहीं करता स्कूल जाता है , नहीं नहीं कॉलेज में पढ़ता है , सागर की नौकरी भी लग जाएगी वह कहता है फिर दोनों इस शहर को छोड़ कर चले जाएँगे , दिल्ली में रहेंगे । दिल्ली का सोचकर खुश हो जाती है वो , वहाँ बिजली होगी और पानी के लिए लाईन भी नहीं लगाना पड़ेगा ।
उस दिन कितनी खुश थी वह मेले में , वहीं तो मिली थी सागर से । लगातार घुरे जा रहा था उसको , पहले तो लगा की कोई लफंगा होगा मगर जब एक बार बात की तो उसकी बातों में बहती चली गई जैसे , कितनी मिठी बातें करता था , कविताँए भी लिखता था , अपना मोबाइल भी था , कितनी फोटो ली थी उसने मिनी की , वह कहता smile और मिनी खिलखिला कर हँस देती ।
जब सागर से मिलकर वापस आई तो वह कुछ ज्यादा ही खुश थी वह , आज सागर ने कहा की उसको नौकरी लग गई है वो दोनों अगले हफ्ते की रेल से दिल्ली चले जाएंगे । पहली बार रेल बैठने का सोच कर डर रही थी मिली लेकिन फिर सागर साथ होगा यह सोचकर ड़र काफुर हो जाता ।
क्या क्या ले जाएगी वो अपने साथ ? कितनी बेवकुफ़ी वाला सवाल है , है ही किया उसके पास दो बर्तन और कपड़े और माँ की दी हुई वो वाली माला , मोतीयों वाली , उसमें भी कुछ मोतियों का रंग उतर गया है मगर कैसे फेंक दे एक वही गहना तो है उसके पास । सागर ने कहा है बस खाली हाथ आ जाने को , दिल्ली में उसके लिए नए कपड़े लेगा वो ।
अगले एक हफ्ते तक सो भी नहीं पाई वो , अपनी झोपडी रामु काका को दे दी , बेचारे सड़क पर सोते थे , घंटो आशीर्वाद देते रहे थे उसको ।
रेलगाड़ी में बैठने के बाद उसका ड़र खत्म हो गया , सागर से रास्ते भर बस दिल्ली का हाल पुछती रही वह और सागर मुस्कुराकर बताता रहा , सागर ने बताया उसके परिवार में भी कोई नहीं है , कितनी मिलती है उनकी कहानी मिनी भी तो अकेली है दुनिया में । अब वो कभी सागर को अकेलापन महसुस नहीं होने देगी , उसका पुरा ख्याल रखेगी , इन्हीं ख्यालों में कब उसने सागर के कँधो पर सर रखकर आँखे मुँद ली पता ही नहीं चला , एक सुकुन था उसके बाहों में जैसे जिंदगी बस रुक सी गई हो सब थम गया हो ।
जब आँखे खुली तो ट्रेन लगभग खाली हो गई थी सागर जल्दी जल्दी जुते पहन रहा था और उसे उठा रहा था ।
सागर ने कहा की उनके रहने का इतंजाम हो गया है अब उनकी जिंदगी राजा की तरह कटेगी , दोनों एक कमरे में पहुँचे थोड़ा छोटा था मगर कितना प्यारा , वह कमरा उसे उसे स्वर्ग लग रहा था और सागर के चेहरे में कोई देवदुत , कितनी बदल गई थी उसकी जिंदगी पिछले महिनों में , बिना मतलब कोसती थी वह उपर वाले को ।
सागर और वह कपड़े बदलकर वहीं लेट गए , रात भर एक दुसरे में इस कदर खो गए मानों की दो नहीं एक शराीर हो , प्यार को साबीत करने का वो अंतहीन सिलसिला रात भर चलता रहा । पहले भी सागर ने कहा था उसको लेकिन मिनी हर बार टाल देती थी , साथ की लड़कीयाँ कहती थी यह सही नहीं है लेकिन बस अब और नहीं आज तो वह खुद को सागर को सौंप देना चाहती थी , अब कोई कारण भी तो नहीं था दुरी बनाने का , आखीर अब दोनो एक हो गए थे ।
सुबह सागर उसे लेकर अपनी मौसी से मिलने के लिए चलने को कहा , नए कपड़े और गहने लेकर आया था वो कहा की मौसी के साथ मंदीर जाकर के शादी कर लेंगे फीर साथ हमेशा के लिए । मौसी भी बड़ी खुशमिजाज थी , बात बात पर हँसी मजाक कर रही थी , सबने साथ में खाना खाया और सागर शादी के सामान लाने बाहर चला गया ।
जब से खाना खाया था मिनी को निंद आ रही थी तो वह सोने को चली गई , जब वह सोकर उठी तो सागर वहाँ नहीं था । जाकर मौसी से मिली तो उन्होनें उसे अँधेरे कमरे में धकेल दिया , ना जाने कितने दिनों तक खाना नहीम दिया पानी भी नहीं । जब बाहर निकाला तो कई गिद्ध की भाँती उसपर टुट पड़े, उसकी बोली लगी । एक छोटे से कमरे में , बस एक बिस्तर में सिमट गई थी मिनी की जिंदगी , साथ की लड़कीयाँ कहती थी की एक लाख में उसका सौदा हुआ था लेकिन मिनी मानने को तैयार नहीं थी जरुर इन लोगों ने उसके सागर के साथ कुछ कर दिया होगा ।
रोज ना जाने कितने मर्द उसके कमरे में आते , इसके रुह को छलनी करते मगर आज भी मिनी हर चेहरे में सागर को ढुँढती थी , ना जाने कब आएगा वो शादी का समान लेकर ।

अंतहीन सफर जारी है , आज भी मिनी सागर के पसंद की गुलाबी साड़ी ही पहनती है ।।।

Tuesday, 2 August 2016

ये तो बस Precaution था.......

राजनीति की चौपड़ पर अंग्रेजों ने एक विशेष चाल चली। इसका राष्ट्रीय घटनाओं के समूचे भविष्य पर भारी प्रभाव पड़ा , इतना भारी की अंग्रेजों ने शायद कभी उसकी कल्पना भी नहीं की होगी । अंग्रेज 1857 के झटके तो किसी तरह से झेल गए ,लेकिन  जनता और सैनिकों की रोष की ज्वाला भीतर ही भीतर बराबर सुलगती रही ।
यदा कदा वह किसी न किसी बहाने देश के कुछ हिस्सों में फुट निकलती थी । वासुदेव बलवन्त फड़के के नेतृत्व में महाराष्ट्र में और पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में जिन क्रांतिकारी धमाकों ने अंग्रेजी सरकार को अन्दर तक हिला के रख दिया ओ तो समुन्द्र में बस बून्द भर के समान थी ।

एलन ऑक्टविअन ह्यूम नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने , जो 1857 की भीषण यातना को भोग चुका था और जो खरगोश की तरह चौकन्ना रहता था , आने वाले विस्फोट की गडगडाहट को स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था । देश भर में फैले तीस हज़ार से भी अधिक सुचनदाताओं से ह्यूम को यह पक्का निश्चय हो गया था की सामान्य जनता के आर्थिक कष्टों और बुद्धिजीवियों के उपेक्षा के कारण निकट भविष्य में एक भयंकर विस्फोट होने का संकट पैदा हो गया है ।

कैसा होगा ये भयंकर विस्फोट , उसके बारे में ए. ओ . ह्यूम के बायोग्राफी में विलियम बेडरबर्न ने लिखा है - " अनगिनत प्रविष्टियों से पता चलता है की गुप्त रूप से पुरानी तलवारों, भाले और तोड़ेदार बन्दुके एकत्र की जा रही हैं जो जरुरत पड़ने पर तैयार मिलेंगी । ऐसा कहा गया है की अचानक हिंसा भड़केगी , चारों ओर अपराधों का बाजार गर्म हो जायेगा , अवांछित व्यक्तियों की हत्या होगी , महाजनों और बाजारों को दिन-दहाड़े लूटा जायेगा । लोग तो इस समय अधभूखे , अधनगें हैं ही । शिक्षित वर्गों का एक छोटा सा वर्ग जो इस समय शायद अकारण ही सरकार का घोर विरोधी है , आन्दोलन में भाग लेगा , यत्र - तत्र नेतृत्व संभालेगा , आंदोलन समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा " । (1)

ह्यूम को अब पूर्ण विश्वास हो चला था की बढ़ती हुई अलोकप्रियता को कम करने के लिए तत्काल एक ठोस कार्यक्रम की आवयश्कता है ।

ह्यूम ने स्वयं स्पष्ठ रूप से कहा है की कांग्रेस की स्थापना के पीछे उनका क्या उद्देश्य था - " इस बात की तत्काल जरुरत है की हमारे अपने कार्य के फलस्वरूप जो बड़ी शक्तियां उभर रही हैं उनसे छुटकारा पाने के लिए कोई रक्षोपाय किया जाये और हमारे कांग्रेस आन्दोलन से बढ़कर क्या कोई अन्य रक्षोपाय हो सकता है ? (2)

डॉक्टर पि . सितराम्मैया ने " Indian national congress " का जो अधिकृत इतिहास लिखा है , उसमे भी कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि की पुष्टि की गयी है : " श्री ह्यूम के पास इस बात का अकाट्य प्रमाण था की राजनीतिक असंतोष भीतर ही भीतर सुलग रहा था ..... उसके आधार पर ह्यूम ने निश्चय किया की इस असंतोष को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कोई द्वार तैयार किया जाये और कांग्रेस ही सुरक्षा-द्वार बन सकती है । " (3)

प्रारंभ में तो कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन पूर्णतः उसके संस्थापकों की चाहतों की हिसाब से चला । जो कार्यक्रम तैयार किया गया और जो नेता सामने लाये गए , उनका उदेश्य राष्ट्रीय मंच पर एक नए नेतृत्व को लाना था , जिसकी प्रथम योग्यता यह हो की ओ आँखे मूंद कर के ब्रिटिश राजछत्र के प्रति निष्ठावान रहे ।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 में बम्बई में हुआ , दूसरा कोलकाता में और तीसरा मद्रास में हुआ । प्रत्येक अधिवेशन में कांग्रेस प्रतिनिधियों की प्रसंशा सम्बद्ध अंग्रेज गवर्नरों ने की । वास्तव में सर्वप्रथम तो यह भी निश्चय किया गया था की बम्बई का गवर्नर स्वयं प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करे , लेकिन बाद में यह विचार त्याग दिया गया , क्योंकि उससे उनके इरादों का खुलेआम ढिंढोरा पिट जाता । अंतिम समय में व्योमेस चंद्र बनर्जी को अध्य्क्ष बनाया गया । जैसी की आशा थी की , अद्यक्षिय भाषण में इस बात के लिए भूरी- भूरि प्रशंशा की गयी थी की - " अंग्रेज़ी राज की कृपापूर्ण घनी छाहँ में देश को अनेकानेक लाभ प्राप्त हुए । "

कांग्रेस के द्वितीय अध्य्क्ष दादा भाई नौरेजी ने विनम्रता और गर्व से कहा की वे ब्रिटिश साम्राजय की दूसरी शिला रख रहे हैं ।

सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने , जो 1895 के अध्य्क्ष थे , ने कामना की कि ब्रिटिश साम्राज्य अमर हो और 1902 में उन्होंने पुनः कहा की भारतीयों की सर्वोपरि चाहत थी की उन्हें स्वासशि देशों के उस महासंघ में स्थान मिले , इंग्लैंड जिसकी महिमामयी माता थी ।

यह स्मरण रखना होगा की दादा भाई नौरेजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - जैसे महारथी उस काल के सबसे बड़े राष्ट्रवादियों में से थे ।

(1)-  वेडरबर्न - Life history of A.O. hume
(2)- तदेव - पृ- 77
(3) - P. sItaramaiya - The history of indian national congress


                             - और देश बँट गया
                               हो . वी . शेषाद्रि

Thursday, 7 July 2016

एक चिठ्ठी और.....

आदरणीय रविश जी एवं रोहित जी
नमस्कार

कल से आपके पत्रों की बड़ी चर्चा सुन रहा हूँ , माफ़ी चाहता हूँ इस गुस्ताखी के लिए लेकिन आपको पढ़ कर सुन कर हमेशा प्रेरित होता रहा हूँ तो इस बार भी खुद को रोक नहीं पाया ।
मैं किसी चैनल का एंकर नहीं हूँ न ही मेरे किसी रिश्तेदार को राज्यसभा की सदस्यता , निरपेक्षता ही हद समझ लीजिये की अब तक सरकार ने वोट का अधिकार भी नहीं दिया है । अभी पिछले ही साल पत्रकारिता की पढाई करने आया हूँ । साइन्स से बारहवी करने के बाद घर वालों को इसके लिए मना पाना आसान नहीं था , बहुत से सवाल थे और जिद भी करनी पड़ी और अंत में जाकर साथ में competiton की तैयारी भी करता रहूँगा इस नसीहत के साथ आने की इजाजत मिली ।

जब विश्वविद्यालय में कदम रखा तो बड़ा खुश था और हौसला कुछ ज्यादा ही मजबूत लेकिन जब पहली ही क्लास में इंट्रोडक्शन के दौरान पूछा गया की पत्रकारिता क्यों करना चाहते हो तो कुछ का जवाब था ग्लैमर , टीवी पर दिखना और कुछ ने तो यहाँ तक कह डाला था की कहीं और admisson नहीं मिला इसलिए ( ओ 5-6 लाख नहीं देते हैं , 60 हज़ार वाले कूड़े का ढ़ेर हैं ) लेकिन मैंने हिम्मत नहीं हारी क्यूंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।

कुछ ही फिन बीते होंगे की सीनियर्स के साथ उठना बैठना सुरु हुआ तो पता चला की ओ पत्रकारों को मीडिया मजदुर कहते हैं और जहाँ मैं 15-20 समझ रहा था 7 हज़ार की नौकरी मिलती है । एक को पढ़ा की अगर पत्रकार बनना है तो सर्विस वाली लड़की से शादी करना , अभी एक बैच आँखों के सामने से पास आउट हुआ उनमे से एक ने लिखा की पत्रकारों के भूखे मरने की नौबत आ रही है ( सबकी लेखनी फेसबुक पर हुई थी ) लेकिन मेरा हौसला बना रहा क्योंकि आदर्श आप जैसे लोग थे ।

एक कदम आगे बढ़कर इंटर्न ज्वाइन किया तो उन्होंने सलाह दी की जो 60 हज़ार यहाँ विश्वविद्यालय में दोगे उसकी जगह ठेला लगालो ज्यादा फायदे में रहोगे । पहले ही दिन एक प्रोफेसर सर ने कहा था की " दुःख होता है जब तुम जैसे लोग हर साल जिंदगी ख़राब करने आते हैं " लेकिन मेरा हौसला बना रहा था ।

मुझे तो दो दिन हुए हैं लेकिन माँ बाप को लगता है बेटा पत्रकार बन गया है , जब कहीं किसी पत्रकार पर हमले की या मौत की खबर आती है तो रात भर फ़ोन आते रहते हैं , कभी कभी तो मुझे भी सपने आने लगते हैं लेकिन हौसला नहीं हारा ।
आपको पढ़ा तो लग रहा है ये कैसा पेशा है शिर्ष पर होने के बावजूद दो लोग अपनी मानसिक पीड़ा में पत्रकारिता को भूल गए , नयी पीढ़ी को हौसला देने के बजाये रविश कुमार ने हमें एम . जे . अकबर बन ने की सिख दी ( उन्ही एम जे अकबर को पत्रकारिता का बिचौलिया भी कहा है ) , आपने पत्रकारिता कर रहे लोगों को हौसला देने की जगह उन्हें कूड़े का ढेर कहा और हमारे रोहित जी को भी समस्या इस बात से नहीं की बात क्या है उन्हें अपना राष्ट्रवाद दिखाना है । अब सोच रहा हूँ पापा को फ़ोन कर ही दूँ की मई घर आ रहा हूँ , क्योंकि मैं ऐसी पत्रकारिता करने नहीं आया था ।

मैंने कहा की ये तो कस्तूरी और हिरन की जैसी लड़ाई है , अपने ही नाभि के सुगंध को ढूंढने में ये प्राण दे रहे हैं , ये अपनी आपसी टकराव में पेशे को बदनाम कर रहे हैं लेकिन बाद में बताया की नहीं ये स्वहित की नहीं विचारधारा की लड़ाई है ।

मैं नहीं जानता ये किसकी लड़ाई है लेकिन दाव पर पत्रकारिता लगी है , आपके पुर्वजों ने आपके हाथों में पत्रकारिता को एक हथियार बना कर दिया था ताकि आप कमजोरों की लड़ाई लडें अब देखना है की आप हमारे हाथों में पत्रकारिता को क्या बना कर देते हैं ।

आपकी अगली पीढ़ी ।

Friday, 29 April 2016

मैं हुँ ही सवाली - बाबा साहब अंबेडकर - I

जब विश्व प्रथम विश्व युद्ध की चपेट में था । लाला लाजपत राय उस समय अमेरीका में थे जब आंबेडकर अपना अध्धयन कर रहे थे । श्री 'एडविन ' लाजपतराय के घनिष्ट मित्र थे , वे प्रोफेसर थे । आंबेडकर उन्हें अच्छी तरह जानते थे । ब्रिटिश खुफिया विभाग के अफसरों का ख्याल था कि आंबेडकर "भारतीय क्रांती दल " के सदस्य हैं । प्रोफेसर एडविन को भारतीय राजनीतिक दल से जोडने की पेशकश कर चुके थे , किन्तु आंबेड़कर ने स्पष्ट शब्दों में कहा था "वह विधार्थी हैं और उनको महाराजा बड़ौदा को दिए गए वचन के अनुसार पूरा ध्यान अघ्धयन पर केंद्रीत करना है , क्योंकी उन्हें ऐसा स्वर्ण अवसर प्रदान किया है जिसे वो किसी कीमत पर छोड़ना नहीं चाहते हैं ( राष्ट्र की किमत पर भी नहीं )" ।। 1 &  2
कहते हैं

।। होनहार बान के होत चिकने पात ।।

आंबेडकर के चिकने पात भी हमें उनके छात्र जिवन से ही मिलने लगते है । जब राष्ट्र अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रहा था और एक बालक का भी रक्त उबाल मार रहा था की वह राष्ट्र के लिए जान दे दे , तब भारत के एक महान "पुत्र" को राष्ट्र की नहीं अपने अध्धयन की चिंता खाए जा रही थी ।

मैं अब तक नहीं समझ पाया की विदेशों में ऐसी कौन सी पढ़ाई उस वक्त करवाई जाती थी जो की लोगों को जनता से जुड़ना सिखाती थी । क्युँकी हमारे सारे राष्ट्र निर्माताओं का सृजनकर्ता कोइ और रही विदेशी संस्थान रही है । नेहरु , गाँधी , आंबेडकर आदी अधिकतर नेताओं को भारतीय जनता के दर्द का एहसास विदेशों में सैंपेन की ग्लास खनकाते हुए हुआ । भारतियों के भुखे पेट का एहसास उन्हें तब हुआ जब वो अपने माशुकाओं के साथ मखमली बिस्तरों मे लेटे हुए थे ।
राजेश नायक जी के सलाह पर मैनें आंबेडकर को पढ़ने , अथवा गंभीरता से पढ़ने की शुरुआत की । आज जब मैनें आंबेड़कर से जुड़े कुछ साहित्य को पढ़ लिया तो कुछ सवाल मेरे मन में आए जिनका जवाब कोई भी ग्रंथ मुझे नहीं पाया । मैं किसी का विरोधी नहीं हुँ बस कुछ सवाल हैं जो मन में उठते हैं । आपसे निवेदन है की बिना किसी पुर्वाग्रह से ग्रसीत हुए मेरे सवालों को पढ़ें एवं अगर सँभव हो तो मेरी शँकाओ का समाधान करें ।

पुरे समय के दौरान मुझे एक भी ऐसा प्रसंग नहीं मिला जिसमें राष्ट्र को अँग्रेजों के पाष से मुक्त कराने के किसी संघर्ष में आंबेडकर ने प्रत्यक्ष भुमिका निभाई हो या गरीब किसानों के या मजदुरों के अधिकारों के लिए आवाज उठाई हो । उनका संपुर्ण संघर्ष एक कमरे में सीमित था जहाँ बैठकर आप समाजिक इंजीनियरिंग का खाका तैयार किया करते थे । अत:  आंबेडकर का स्वतंत्रता अथवा समानता संग्राम केवल विचारों तक में सीमित था , अब अगर केवल विचारों से कोई मसिहा माना जा सकता है तो "राहुल गाँधी के विचार कौन से बुरे हैं ?"
आज अगर कोई व्यक्ती स्वतंत्रता सेनानी है तो उसका सत्यापन और पेंशन भी इसी आधार पर होता है की उसने कितना समय अंग्रेजी शासन के दौरान जेल मे बिताया क्योंकी अंग्रेजों के मुताबीक किसी भी स्वतंत्रता सेनानी की असल जगह जेल में होती थी । इस आधार को मान के चलने पर तो आंबेडकर साहब स्वत्रंता सेनानी भी नहीं थे , क्युँकी स्वतंत्रता संग्राम के दौरान बाबा साहब की एक भी रात जेल में नहीं कटी । तो फीर किस आधार पर उनके स्वतंत्रता सेनानी होने का दंभ भरा जाता है ? जबकी वह तो स्वतंत्रता सेनानी पेंशन के भी अधीकारी नहीं हैं ।

सन् 1931 जब पुरा देश कराह रहा था हर तरफ से उत्पिडन की खबरें आ रही थी , माँ बहनों की अस्मत खतरे में थी । वह ऐसा दौर था जव एक आम भारतवासी साँस लेने से भी पहले भारत के आजाद होने का सोचता था तब बाबा को गोलमेज सम्मेलन में भारत के प्रतिनिधीत्व का अवसर मिला मगर वहाँ आजादी के लिए मुखर तौर पर आवाज उठाने के बजाय , आप गोलमेज सम्मेलन में भारत की बुराई करने में लगे थे और आपको भारत के लिए स्वतंत्रता नहीं बल्की  " आरक्षण " चाहीए था । अब अगर एक अंतराष्ट्रिय सम्मेलन में जाकर अपने मातृभुमी को कोसना , अवगुन गिनाना गलत नहीं है , तो आजम खान ने UN को चिट्ठी लिखकर क्या गलत किया ?  

हिँदु समाज को सुधारने का ठेका लेकर आपने "हिँदु कोड बिल" का रोना रोया और हिन्दुओं के धार्मिक ग्रंथ -मनुस्मृती को जलाया- । हिँदु कोड़ बिल में सबसे महत्वपुर्ण बात दो शादियों के प्रचलन को रोकना था , मगर अचरज की बात है की सन् 1948 में जब आपकी उम्र 55 वर्ष थी तो आपने शारदा कबीर नाम के ब्राहमन महिला से 15 अप्रैल 1948 को दुसरा विवाह कर लीया । जिनका नाम उसके पश्चात बदलकर सविता आंबेडकर कर दिया गया ।
तो क्या ।।हाथी के दाँत खाने को कुछ और दिखाने को कुछ और ।।

ऐसे और दर्जनों प्रसंग हैं जिनका वर्णन अगली कड़ी में करुँगा तब तक आपसे विनम्र निवेदन है की इस बाल मन की शंका को दुर करें और मुझे बताँए की मैं क्यों आंबेडकर को सम्मान दुँ ।।

मैं क्युँ उनपर आरोप ना लगाउँ ?



1. डा. राजेन्द्र मोहन भ़टनागर           डा. आंबेडकर जिवन और दर्शन --- पृष्ट  10 - 34
2. डा. जी. पी . काशिव               डा. आंबेडकर के विचार    --- पृष्ट  80 - 95