राजनीति की चौपड़ पर अंग्रेजों ने एक विशेष चाल चली। इसका राष्ट्रीय घटनाओं के समूचे भविष्य पर भारी प्रभाव पड़ा , इतना भारी की अंग्रेजों ने शायद कभी उसकी कल्पना भी नहीं की होगी । अंग्रेज 1857 के झटके तो किसी तरह से झेल गए ,लेकिन जनता और सैनिकों की रोष की ज्वाला भीतर ही भीतर बराबर सुलगती रही ।
यदा कदा वह किसी न किसी बहाने देश के कुछ हिस्सों में फुट निकलती थी । वासुदेव बलवन्त फड़के के नेतृत्व में महाराष्ट्र में और पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में जिन क्रांतिकारी धमाकों ने अंग्रेजी सरकार को अन्दर तक हिला के रख दिया ओ तो समुन्द्र में बस बून्द भर के समान थी ।
एलन ऑक्टविअन ह्यूम नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने , जो 1857 की भीषण यातना को भोग चुका था और जो खरगोश की तरह चौकन्ना रहता था , आने वाले विस्फोट की गडगडाहट को स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था । देश भर में फैले तीस हज़ार से भी अधिक सुचनदाताओं से ह्यूम को यह पक्का निश्चय हो गया था की सामान्य जनता के आर्थिक कष्टों और बुद्धिजीवियों के उपेक्षा के कारण निकट भविष्य में एक भयंकर विस्फोट होने का संकट पैदा हो गया है ।
कैसा होगा ये भयंकर विस्फोट , उसके बारे में ए. ओ . ह्यूम के बायोग्राफी में विलियम बेडरबर्न ने लिखा है - " अनगिनत प्रविष्टियों से पता चलता है की गुप्त रूप से पुरानी तलवारों, भाले और तोड़ेदार बन्दुके एकत्र की जा रही हैं जो जरुरत पड़ने पर तैयार मिलेंगी । ऐसा कहा गया है की अचानक हिंसा भड़केगी , चारों ओर अपराधों का बाजार गर्म हो जायेगा , अवांछित व्यक्तियों की हत्या होगी , महाजनों और बाजारों को दिन-दहाड़े लूटा जायेगा । लोग तो इस समय अधभूखे , अधनगें हैं ही । शिक्षित वर्गों का एक छोटा सा वर्ग जो इस समय शायद अकारण ही सरकार का घोर विरोधी है , आन्दोलन में भाग लेगा , यत्र - तत्र नेतृत्व संभालेगा , आंदोलन समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा " । (1)
ह्यूम को अब पूर्ण विश्वास हो चला था की बढ़ती हुई अलोकप्रियता को कम करने के लिए तत्काल एक ठोस कार्यक्रम की आवयश्कता है ।
ह्यूम ने स्वयं स्पष्ठ रूप से कहा है की कांग्रेस की स्थापना के पीछे उनका क्या उद्देश्य था - " इस बात की तत्काल जरुरत है की हमारे अपने कार्य के फलस्वरूप जो बड़ी शक्तियां उभर रही हैं उनसे छुटकारा पाने के लिए कोई रक्षोपाय किया जाये और हमारे कांग्रेस आन्दोलन से बढ़कर क्या कोई अन्य रक्षोपाय हो सकता है ? (2)
डॉक्टर पि . सितराम्मैया ने " Indian national congress " का जो अधिकृत इतिहास लिखा है , उसमे भी कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि की पुष्टि की गयी है : " श्री ह्यूम के पास इस बात का अकाट्य प्रमाण था की राजनीतिक असंतोष भीतर ही भीतर सुलग रहा था ..... उसके आधार पर ह्यूम ने निश्चय किया की इस असंतोष को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कोई द्वार तैयार किया जाये और कांग्रेस ही सुरक्षा-द्वार बन सकती है । " (3)
प्रारंभ में तो कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन पूर्णतः उसके संस्थापकों की चाहतों की हिसाब से चला । जो कार्यक्रम तैयार किया गया और जो नेता सामने लाये गए , उनका उदेश्य राष्ट्रीय मंच पर एक नए नेतृत्व को लाना था , जिसकी प्रथम योग्यता यह हो की ओ आँखे मूंद कर के ब्रिटिश राजछत्र के प्रति निष्ठावान रहे ।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 में बम्बई में हुआ , दूसरा कोलकाता में और तीसरा मद्रास में हुआ । प्रत्येक अधिवेशन में कांग्रेस प्रतिनिधियों की प्रसंशा सम्बद्ध अंग्रेज गवर्नरों ने की । वास्तव में सर्वप्रथम तो यह भी निश्चय किया गया था की बम्बई का गवर्नर स्वयं प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करे , लेकिन बाद में यह विचार त्याग दिया गया , क्योंकि उससे उनके इरादों का खुलेआम ढिंढोरा पिट जाता । अंतिम समय में व्योमेस चंद्र बनर्जी को अध्य्क्ष बनाया गया । जैसी की आशा थी की , अद्यक्षिय भाषण में इस बात के लिए भूरी- भूरि प्रशंशा की गयी थी की - " अंग्रेज़ी राज की कृपापूर्ण घनी छाहँ में देश को अनेकानेक लाभ प्राप्त हुए । "
कांग्रेस के द्वितीय अध्य्क्ष दादा भाई नौरेजी ने विनम्रता और गर्व से कहा की वे ब्रिटिश साम्राजय की दूसरी शिला रख रहे हैं ।
सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने , जो 1895 के अध्य्क्ष थे , ने कामना की कि ब्रिटिश साम्राज्य अमर हो और 1902 में उन्होंने पुनः कहा की भारतीयों की सर्वोपरि चाहत थी की उन्हें स्वासशि देशों के उस महासंघ में स्थान मिले , इंग्लैंड जिसकी महिमामयी माता थी ।
यह स्मरण रखना होगा की दादा भाई नौरेजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - जैसे महारथी उस काल के सबसे बड़े राष्ट्रवादियों में से थे ।
(1)- वेडरबर्न - Life history of A.O. hume
(2)- तदेव - पृ- 77
(3) - P. sItaramaiya - The history of indian national congress
- और देश बँट गया
हो . वी . शेषाद्रि
यदा कदा वह किसी न किसी बहाने देश के कुछ हिस्सों में फुट निकलती थी । वासुदेव बलवन्त फड़के के नेतृत्व में महाराष्ट्र में और पंजाब में रामसिंह कूका के नेतृत्व में जिन क्रांतिकारी धमाकों ने अंग्रेजी सरकार को अन्दर तक हिला के रख दिया ओ तो समुन्द्र में बस बून्द भर के समान थी ।
एलन ऑक्टविअन ह्यूम नामक एक अंग्रेज अधिकारी ने , जो 1857 की भीषण यातना को भोग चुका था और जो खरगोश की तरह चौकन्ना रहता था , आने वाले विस्फोट की गडगडाहट को स्पष्ट रूप से अनुभव कर लिया था । देश भर में फैले तीस हज़ार से भी अधिक सुचनदाताओं से ह्यूम को यह पक्का निश्चय हो गया था की सामान्य जनता के आर्थिक कष्टों और बुद्धिजीवियों के उपेक्षा के कारण निकट भविष्य में एक भयंकर विस्फोट होने का संकट पैदा हो गया है ।
कैसा होगा ये भयंकर विस्फोट , उसके बारे में ए. ओ . ह्यूम के बायोग्राफी में विलियम बेडरबर्न ने लिखा है - " अनगिनत प्रविष्टियों से पता चलता है की गुप्त रूप से पुरानी तलवारों, भाले और तोड़ेदार बन्दुके एकत्र की जा रही हैं जो जरुरत पड़ने पर तैयार मिलेंगी । ऐसा कहा गया है की अचानक हिंसा भड़केगी , चारों ओर अपराधों का बाजार गर्म हो जायेगा , अवांछित व्यक्तियों की हत्या होगी , महाजनों और बाजारों को दिन-दहाड़े लूटा जायेगा । लोग तो इस समय अधभूखे , अधनगें हैं ही । शिक्षित वर्गों का एक छोटा सा वर्ग जो इस समय शायद अकारण ही सरकार का घोर विरोधी है , आन्दोलन में भाग लेगा , यत्र - तत्र नेतृत्व संभालेगा , आंदोलन समन्वय स्थापित करेगा और राष्ट्रीय विद्रोह के रूप में उसका संचालन करेगा " । (1)
ह्यूम को अब पूर्ण विश्वास हो चला था की बढ़ती हुई अलोकप्रियता को कम करने के लिए तत्काल एक ठोस कार्यक्रम की आवयश्कता है ।
ह्यूम ने स्वयं स्पष्ठ रूप से कहा है की कांग्रेस की स्थापना के पीछे उनका क्या उद्देश्य था - " इस बात की तत्काल जरुरत है की हमारे अपने कार्य के फलस्वरूप जो बड़ी शक्तियां उभर रही हैं उनसे छुटकारा पाने के लिए कोई रक्षोपाय किया जाये और हमारे कांग्रेस आन्दोलन से बढ़कर क्या कोई अन्य रक्षोपाय हो सकता है ? (2)
डॉक्टर पि . सितराम्मैया ने " Indian national congress " का जो अधिकृत इतिहास लिखा है , उसमे भी कांग्रेस की स्थापना की पृष्ठभूमि की पुष्टि की गयी है : " श्री ह्यूम के पास इस बात का अकाट्य प्रमाण था की राजनीतिक असंतोष भीतर ही भीतर सुलग रहा था ..... उसके आधार पर ह्यूम ने निश्चय किया की इस असंतोष को सुरक्षित बाहर निकालने के लिए कोई द्वार तैयार किया जाये और कांग्रेस ही सुरक्षा-द्वार बन सकती है । " (3)
प्रारंभ में तो कांग्रेस के वार्षिक अधिवेशन पूर्णतः उसके संस्थापकों की चाहतों की हिसाब से चला । जो कार्यक्रम तैयार किया गया और जो नेता सामने लाये गए , उनका उदेश्य राष्ट्रीय मंच पर एक नए नेतृत्व को लाना था , जिसकी प्रथम योग्यता यह हो की ओ आँखे मूंद कर के ब्रिटिश राजछत्र के प्रति निष्ठावान रहे ।
कांग्रेस का प्रथम अधिवेशन 1885 में बम्बई में हुआ , दूसरा कोलकाता में और तीसरा मद्रास में हुआ । प्रत्येक अधिवेशन में कांग्रेस प्रतिनिधियों की प्रसंशा सम्बद्ध अंग्रेज गवर्नरों ने की । वास्तव में सर्वप्रथम तो यह भी निश्चय किया गया था की बम्बई का गवर्नर स्वयं प्रथम अधिवेशन की अध्यक्षता करे , लेकिन बाद में यह विचार त्याग दिया गया , क्योंकि उससे उनके इरादों का खुलेआम ढिंढोरा पिट जाता । अंतिम समय में व्योमेस चंद्र बनर्जी को अध्य्क्ष बनाया गया । जैसी की आशा थी की , अद्यक्षिय भाषण में इस बात के लिए भूरी- भूरि प्रशंशा की गयी थी की - " अंग्रेज़ी राज की कृपापूर्ण घनी छाहँ में देश को अनेकानेक लाभ प्राप्त हुए । "
कांग्रेस के द्वितीय अध्य्क्ष दादा भाई नौरेजी ने विनम्रता और गर्व से कहा की वे ब्रिटिश साम्राजय की दूसरी शिला रख रहे हैं ।
सुरेन्द्र नाथ बनर्जी ने , जो 1895 के अध्य्क्ष थे , ने कामना की कि ब्रिटिश साम्राज्य अमर हो और 1902 में उन्होंने पुनः कहा की भारतीयों की सर्वोपरि चाहत थी की उन्हें स्वासशि देशों के उस महासंघ में स्थान मिले , इंग्लैंड जिसकी महिमामयी माता थी ।
यह स्मरण रखना होगा की दादा भाई नौरेजी और सुरेन्द्रनाथ बनर्जी - जैसे महारथी उस काल के सबसे बड़े राष्ट्रवादियों में से थे ।
(1)- वेडरबर्न - Life history of A.O. hume
(2)- तदेव - पृ- 77
(3) - P. sItaramaiya - The history of indian national congress
- और देश बँट गया
हो . वी . शेषाद्रि
