Sunday, 25 October 2015

आधुनिक नारी - दर्शन


कल क्लास के ग्रुप में एक सहपाठी छात्रा ने महिलाओं का गुणगान करने वाला एक संदेश प्रेषित कीया।
इसमें एक स्वामीजी के प्रवचन का उद्धरण देते हुए पुरुषों को लोहे के समान तथा महिलाओं को हिरे के समान बतलाया था ।
ऐसा नहीं है कि मैं महिलाओं का विरोधी हुँ।
लेकिन इस तरह के विचार देखकर न जाने क्यों ससनसनी सी दौड़ जाती है।
आप सुबह उठकर उम्मीद करती हैं कि आपका पुरूष मित्र आपको फोन करके प्रेमालाप करेगा , आप फोन नहीं करेंगे क्योंकि आप महिला हैं ।
बस में आप उम्मीद करती हैं आपको खड़ा देख कोई पुरुष सीट छोड़ दे । क्योंकि आप महिला हैं !
लिफ्ट में जाते वक्त अगर वजन लिमिट से ज्यादा हो जाए तो कोई लडका उतर जाए ।क्योंकि आप एक महिला हैं!
आप चाहती हैं  की शिक्षक कक्षा में आपसे नम्रता से बात करे, गलती होने पे नजर अंदाज करे । क्योंकि आप एक महिला  हैं!
ऐसे और न जाने कई बिंदु हैं जहाँ आप खुद को अपने ही मुख से कमजोर  कहती हैं।
माफ किजीएगा मगर मुझे नहीं लगता आप एक ऐसा समाज चाहती हैं जहाँ स्त्री -पुरुष समानता हो ।
आप एक महिला प्रधान समाज की स्थापना  चाहती हैं, जहाँ सब कुछ आपके मुताबिक़ हो । आपकी सहूलियत के हिसाब से।
माफ किजीएगा मगर यह न हीं न्याय संगत है न ही तर्कसंगत।
और अंत में बता दुँ लोहा आधार होता है, जबकि हिरा कीमती होकर भी मात्र श्रिंगार की वस्तु।
तो स्त्री को हिरा बताकर उसे श्रिगांर और विलासिता भर में सिमित न कर दें।

Thursday, 15 October 2015

कहरों का कहर


आम आदमी की ज़िन्दगी ठीक वैसी है, जैसी किसी विशाल जंगल में मेमने की होती है. हर कदम पर मौत. सड़क हादसे से बच गए तो मिलावट मार सकती है. मिलावट से बच गए तो गलत इलाज मार सकती है. इलाज सही मिल गया तो अस्पताल का भारी भरकम बिल मार सकता है. और तो और एक छोटे से मच्छर से भी उसे बच कर संभल कर रहना है.
unsure emoticon
‪#‎डेंगू‬

Wednesday, 14 October 2015

एक और बेमेल ब्याह


भाजपा - जदयु गठबंधन को बिना मेल का ब्याह बताकर मिडीया में सुर्खियाँ बटोरने वाले लालु ने जब महागठबंधन की बात की तो यह सपष्ट हो गया भारत में राजनीतिक विवाह के लिए अब सोलह गुणों का मिलना अनिवार्यता नहीं रह गई है।
इसी कड़ी में एक और नाम जोडते हुए शिवसेना ने बिगुल फुँक दिया है , वो कमर कसकर मैदान में कूद पड़ी है । कभी बिहारियों की धुर विरोधी माने जाने वाली शिवसेना का बिहार में चुनाव लडना भी बदलती राजनीतिक बयार को दर्शाती है ।
पड़ताल की आवश्यकता है कि अचानक उठी इस सियासी भंवर की जड़ कहाँ है ? और आवश्यकता है यह सुनिश्चित करने की कि इस भंवर मे नेस्तानाबुत होने वाला पात्र भारत का आम नागरिक नहीं होगा।
जब राष्ट्र में ऐसी स्थिति हो कि गद्दी पाने के लिए कोई भी किसी का गला काटने को तैयार हो, कोई भी अपनी विचारधारा की बलि चढ़ाने को तैयार हो तो जनता किसपर विश्वास करे ?