कल क्लास के ग्रुप में एक सहपाठी छात्रा ने महिलाओं का गुणगान करने वाला एक संदेश प्रेषित कीया।
इसमें एक स्वामीजी के प्रवचन का उद्धरण देते हुए पुरुषों को लोहे के समान तथा महिलाओं को हिरे के समान बतलाया था ।
ऐसा नहीं है कि मैं महिलाओं का विरोधी हुँ।
लेकिन इस तरह के विचार देखकर न जाने क्यों ससनसनी सी दौड़ जाती है।
आप सुबह उठकर उम्मीद करती हैं कि आपका पुरूष मित्र आपको फोन करके प्रेमालाप करेगा , आप फोन नहीं करेंगे क्योंकि आप महिला हैं ।
बस में आप उम्मीद करती हैं आपको खड़ा देख कोई पुरुष सीट छोड़ दे । क्योंकि आप महिला हैं !
लिफ्ट में जाते वक्त अगर वजन लिमिट से ज्यादा हो जाए तो कोई लडका उतर जाए ।क्योंकि आप एक महिला हैं!
आप चाहती हैं की शिक्षक कक्षा में आपसे नम्रता से बात करे, गलती होने पे नजर अंदाज करे । क्योंकि आप एक महिला हैं!
ऐसे और न जाने कई बिंदु हैं जहाँ आप खुद को अपने ही मुख से कमजोर कहती हैं।
माफ किजीएगा मगर मुझे नहीं लगता आप एक ऐसा समाज चाहती हैं जहाँ स्त्री -पुरुष समानता हो ।
आप एक महिला प्रधान समाज की स्थापना चाहती हैं, जहाँ सब कुछ आपके मुताबिक़ हो । आपकी सहूलियत के हिसाब से।
माफ किजीएगा मगर यह न हीं न्याय संगत है न ही तर्कसंगत।
और अंत में बता दुँ लोहा आधार होता है, जबकि हिरा कीमती होकर भी मात्र श्रिंगार की वस्तु।
तो स्त्री को हिरा बताकर उसे श्रिगांर और विलासिता भर में सिमित न कर दें।
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