Tuesday, 19 January 2016

व्यस्तता का दंभ

काफी दिनों तक बेरोजगार रहने के बाद अचानक से इतना 
व्यस्त हो गया मानो किसी मंत्री के काले धन का हिसाब रखने 
की जिम्मेदारी मिल गई हो ,पुराना समय कितना खुबसुरत था ।

सबकुछ हौले हौले चलता रहता था ,न तो आपको किसी से उधार 
वसुलना होता है न महिला मित्र से घंटो बतियाने की जरुरत,बस उपजाओ 
और खाओ ।
ऐ अलग बात है की ईतनी फुर्सत में होने के बावजुद देवताओं कभी इसका 
सही इस्तेमाल नहीं किया । कभी समय मिला तो जाकर किसी को वरदान 
दे दिया । कभी फुर्त मिली तो जाकर कुंती समान किसी महिला को पुत्र दे 
दिया ।
देवताओं की हमेशा से हीं वृत्ती रही है की जिसे जिस वस्तु की आव्यशकता
नहीं है उसे वो जरुर देते हैं कभी communication gap  के कारण इंद्राशन 
माँग रहे कुँभकरण को निंद्राशन दे दिया तो कभी जबरजस्ती जिन्हे सत्ता 
जहर लगती है उन्हे सत्ता दे दी.. अब इश्वर पर ज्यादा आरोप प्रत्यारोप 
नहीं वरना उसने बदला लेना शुरु किया तो मैं बदले की राजनिती का आरोप
भी नहीं लगा सकता , मेरे साथ तो भीड़ भी आने से रही ।
खैर व्यस्तता पर वापस लौटते हैं । कहते हैं आव्यश्कता हीं आविष्कार की जननी है, 
ठीक उसी प्रकार बेकारी ही व्यस्तता की जननी है । व्यस्त होने का सबसे बडा फायदा
ऐ है की आपको व्यस्त होने का बहाना नहीं करना पड़ेगा .. दुसरा फायदा मम्मी 
पापा को लगता है की बेटा बड़ा हो गया है, सच्चाई तो हमें पता है । 
आप मेरे इस छोटे से लेख को अन्यथा ना लें, इसे लिखने का मकसद ही यही है 
की दुनिया तो पता चले की मैं व्यस्त हुँ ।
अब भाई व्यस्तता कोई घोटाला तो है नहीं की रोज रोज हो , बेकार के लिए 
व्यस्तता की खुशी ऐसी होती है जैसे की गँजे के सर में रांतो रात फसल लहा लहा 
जाए या बाँझ को जुड़वा औलाद हो जाए । मैं इस आनंद का आनंद लेता हुँ आप तब
तक मेरे आप तब तक मेरे आतंक से मुक्ती का जश्न मनाँए , मगर बता दुँ 
आपकी ऐ खुशी क्षणभंगुर है मैं जल्द वापस लौटुँगा ।

-     आपका कथाकथीत प्रिय

     कुमार सौरभ

Sunday, 3 January 2016

मेरी कलम अछुत है।


साहित्य में एक समस्या है कि यहाँ लेखक नहीं लेख अमर होते हैं, हाँ! अगर आप ५-१० अमर लेखों के उत्पादनकर्ता हैं तो आप भी अमर हो सकते हैं। वास्तविकता में लेखकों की जात बड़ी शर्मीली होती है, जब कहीं अमर होने की संभावना बनती है तो कछुए की तरह खोल में सर छुपा के बैठ जाते हैं  । खैर भ्रमित न हों मेरा अमर होने का कोई उद्देश्य नहीं है, गुगल एडसेन्स के कमाई से महीने का राशन चल जाता है , ज्यादा कुछ की तमन्ना भी नहीं है।
अमर होने में भी भाई - भतीजा वाद हावी है,कोई अमर हुआ तो साथ में भवानी बनाकर तलवार को तो किसी ने चेतक कहकर घोड़े को अमर कर दिया  । उसी तरह तलवार और न जाने क्या क्या बोलकर लेखकों ने कलम को अमर कर रखा है। मैं ठहरा विद्रोही बदलाव मुझसे बर्दाश्त होते नहीं,मुझे तो कलम में भी जात नजर आती है, होती भी है। कलमों में भी उँच निच होता है। मैं आपको कलमों की जात के बारे में बताता हूँ।
प्रेमचंद, कालिदास, ग़ालिब की कलम जेनरल कैटेगरी ककी कलम थी, उम्र भर घिसती रही मगर एक ढंग का जुता भी नसीब नहीं हुआ। उम्र भर बेगम से  बेलन  खाए होंगे सो अलग  और उसी बेलन का दर्द उभर-उभर कर कहानियों और शायरीयों में नजर आता रहा।उम्र 4 *4 के कमरे में कट गई क्योंकि जेनरल कटेगरी ककी कलम थी।
अब अफसरों के कलम को ले लें फर्राटेदार चलती है, जेनरल कलम को मुँह चिढाती करोंडों के टेंडर पास करवाती है, कलम भी लाखों खाती है।ऐ कलम तो कागज पर ही तालाब और कुँए भी बना देती है, ऐ है OBC कलम ।
इसके उपर भी एक कलम है, SC/ST कलम ।ऐ कलम सोने की परत चढ़ी होती है ताकि कहीं खराब न हो जाए। आमतौर पर नेताओं के जेब में दिखती है, चलते वक्त थोड़ा लडखडाती है मगर इसकी ताकत का अंदाजा इससे मत लगाइये । जब यह कलम चलती है तो बाकी सब बस बैठकर देखते हैं। आमतौर पर इसका कार्यक्षेत्र कागज के निचे दाहीने कोने पर होता है , मगर पुरे कागज़ की उपयोगिता इसी से तय होती है ।
अब ज्यादा लिखूँगा तो कहीं मेरी कलम दम न तोड़ दे यह समझने में की उसकी जात क्या है?
मेरी कलम अनारक्षीत ही रहे तो बेहतर है। मैं अक्षुत ही रहुँ तो बेहतर है। मैं दूर हीं रहुँ तो बेहतर है।