काफी दिनों तक बेरोजगार रहने के बाद अचानक से इतना
व्यस्त हो गया मानो किसी
मंत्री के काले धन का हिसाब रखने
की जिम्मेदारी मिल गई हो ,पुराना समय कितना
खुबसुरत था ।
सबकुछ हौले हौले चलता रहता था ,न तो आपको किसी से उधार
वसुलना
होता है न महिला मित्र से घंटो बतियाने की जरुरत,बस उपजाओ
और खाओ ।
ऐ अलग बात है की ईतनी फुर्सत में होने के बावजुद देवताओं कभी इसका
सही
इस्तेमाल नहीं किया । कभी समय मिला तो जाकर किसी को वरदान
दे दिया । कभी फुर्त
मिली तो जाकर कुंती समान किसी महिला को पुत्र दे
दिया ।
देवताओं की हमेशा से हीं
वृत्ती रही है की जिसे जिस वस्तु की आव्यशकता
नहीं है उसे वो जरुर देते हैं कभी communication gap
के कारण इंद्राशन
माँग रहे कुँभकरण को निंद्राशन
दे दिया तो कभी जबरजस्ती जिन्हे सत्ता
जहर लगती है उन्हे सत्ता दे दी.. अब इश्वर
पर ज्यादा आरोप प्रत्यारोप
नहीं वरना उसने बदला लेना शुरु किया तो मैं बदले की
राजनिती का आरोप
भी नहीं लगा सकता , मेरे साथ तो भीड़ भी आने से रही ।
खैर व्यस्तता पर वापस लौटते हैं । कहते हैं आव्यश्कता हीं आविष्कार की जननी है,
ठीक उसी प्रकार बेकारी ही व्यस्तता की जननी है । व्यस्त होने का सबसे बडा फायदा
ऐ
है की आपको व्यस्त होने का बहाना नहीं करना पड़ेगा .. दुसरा फायदा मम्मी
पापा को
लगता है की बेटा बड़ा हो गया है, सच्चाई तो हमें पता है ।
आप मेरे इस छोटे से लेख
को अन्यथा ना लें, इसे लिखने का मकसद ही यही है
की दुनिया तो पता चले की मैं
व्यस्त हुँ ।
अब भाई व्यस्तता कोई घोटाला तो है नहीं की रोज रोज हो , बेकार के लिए
व्यस्तता
की खुशी ऐसी होती है जैसे की गँजे के सर में रांतो रात फसल लहा लहा
जाए या बाँझ को
जुड़वा औलाद हो जाए । मैं इस आनंद का आनंद लेता हुँ आप तब
तक मेरे आप तब तक मेरे
आतंक से मुक्ती का जश्न मनाँए , मगर बता दुँ
आपकी ऐ खुशी क्षणभंगुर है मैं जल्द
वापस लौटुँगा ।
- आपका कथाकथीत प्रिय
कुमार सौरभ