इंसान एक प्रगतीशिल प्राणी है । हम जरुरत के हिसाब से बदलना जानते हैं , अपने
इस गुण के कारण तो आजतक अस्तित्व में हैं । मगर न जाने क्युँ ,मैं चाह कर भी बदलाव
की ईस धारा में समा नहीं पाता ।
मेरे एक संभ्रात मित्र हैं , न न मजाक नहीं कर रहा , अरे भाई इंसान तो कुत्ते
को भी मित्र रख लेता है बस इसी तरह उन्होनें मुझे मित्र रखा हुआ है , इस उपकार के
लीए मैं उनका ऋणी हुँ ,सदैव रहुँगा ।
हाँ तो ! संभ्रात मित्र हैं ,
काफी प्रगतीशील विचारों के स्वामी हैं , अफसरों के बीच बैठते हैं , ऊँची पैठ रखते
हैं । शायद उनकी भलमनसाहत है कि मेरी मुर्खता उनसे देखी नहीं जाती , मुझे समझाते
हैं ।
अरे सौरभ ! जब लोग कपडे बदलते
हैं , साबुन - तेल बदलते हैं , विचारधारा बदलते हैं , तो तुम क्युं नहीं बदलना
चाहते ?
उनकी चिंता जायज भी है । हमारा समाज हमेशा से बदलाओं का पक्षधर रहा है ।
देखो हम मुगलों को बदलकर अंग्रेज ले आए , 1947 में हमने देश का नक्शा बदल दिया
, हमनें क्रांतीकारियों की भुमिका बदल दी । हमारे नेता अब तक 100 बार कानुन बदल
चुके हैं , उन्नती के लिए विचारधारा ,पार्टी तक बदल देते हैं । हमने मंदिरों को
प्रेम स्मारकों में बदल दिया , और मैं हुं की बदलने को तैयार नहीं ।
वो समझाते हैं, दिग्गी जी ने बीवी बदल ली , देखो जरा चेहरे पर कैसी लाली है ।
मेरे पडोसी को हीं देख लो , आरक्षण के लिए बाप बदल दिया और हजारों कमा रहे हैं ।
अरे लोग तो जरुरत पड़ने पर बहनों को बीवी में बदल लेते हैं , तुम भी तो रोज कलम
बदलते हो , लेकिन विचार बदलने को तैयार नहीं ।
खुद को प्रगतीशील लेखक कहलवाते हो और बदलाव नहीं झेल पाते ? खैर ज्यादा नहीं लिख पाउँगा
अभी अभी खबर मिली है की मेरे मीत्र चुनावी ड्युटी के दौरान EVM बदलते धराए हैं ।
