Monday, 21 December 2015

पात्र एंव घटनाँए पुर्णत काल्पनिक हैं


इंसान एक प्रगतीशिल प्राणी है । हम जरुरत के हिसाब से बदलना जानते हैं , अपने इस गुण के कारण तो आजतक अस्तित्व में हैं । मगर न जाने क्युँ ,मैं चाह कर भी बदलाव की ईस धारा में समा नहीं पाता  ।
मेरे एक संभ्रात मित्र हैं , न न मजाक नहीं कर रहा , अरे भाई इंसान तो कुत्ते को भी मित्र रख लेता है बस इसी तरह उन्होनें मुझे मित्र रखा हुआ है , इस उपकार के लीए मैं उनका ऋणी हुँ ,सदैव रहुँगा ।
हाँ तो ! संभ्रात मित्र हैं , काफी प्रगतीशील विचारों के स्वामी हैं , अफसरों के बीच बैठते हैं , ऊँची पैठ रखते हैं । शायद उनकी भलमनसाहत है कि मेरी मुर्खता उनसे देखी नहीं जाती , मुझे समझाते हैं ।
अरे सौरभ ! जब लोग कपडे बदलते हैं , साबुन - तेल बदलते हैं , विचारधारा बदलते हैं , तो तुम क्युं नहीं बदलना चाहते ?
उनकी चिंता जायज भी है । हमारा समाज हमेशा से बदलाओं का पक्षधर रहा है ।
देखो हम मुगलों को बदलकर अंग्रेज ले आए , 1947 में हमने देश का नक्शा बदल दिया , हमनें क्रांतीकारियों की भुमिका बदल दी । हमारे नेता अब तक 100 बार कानुन बदल चुके हैं , उन्नती के लिए विचारधारा ,पार्टी तक बदल देते हैं । हमने मंदिरों को प्रेम स्मारकों में बदल दिया , और मैं हुं की बदलने को तैयार नहीं ।
वो समझाते हैं, दिग्गी जी ने बीवी बदल ली , देखो जरा चेहरे पर कैसी लाली है । मेरे पडोसी को हीं देख लो , आरक्षण के लिए बाप बदल दिया और हजारों कमा रहे हैं । अरे लोग तो जरुरत पड़ने पर बहनों को बीवी में बदल लेते हैं , तुम भी तो रोज कलम बदलते हो , लेकिन विचार बदलने को तैयार नहीं ।
खुद को प्रगतीशील लेखक कहलवाते हो और बदलाव नहीं झेल पाते ? खैर ज्यादा नहीं लिख पाउँगा अभी अभी खबर मिली है की मेरे मीत्र चुनावी ड्युटी के दौरान EVM बदलते धराए हैं ।
 

Wednesday, 2 December 2015

एक विशुद्ध प्रेमी


कमप्युटर की  क्लास में मिली धमकी के बाद क्लास में रूकने की ना हिम्मत बची थी न कोई मतलब ।
किसी तरह हिम्मत जुटाता विश्वविधालय से निकलकर हम बगीया पर पहुंचे । जब हिम्मत टुट रही हो और पर्स भी हल्का हुआ पड़ा हो तो  चाय से बेहतर साथी कोई नहीं होता । अपनी इसी मुहब्बत के साथ हम सब बैठे थे , कोई अपनी कहानी बयाँ करने में लगा था कोई विश्व राजनीति में।
हमेशा की भाती " कुछ दे दो बेटा" आवाज आई । बगीया में बैठे हुए ऐ कोई नई बात नहीं थी, मगर आज ऐ नए लोग थे । आँखें उपर उठी तो देखा एक दादा जी करीब 70-75 की उम्र होगी ने दादी का हाथ पकड़ रखा था , दादी देख नहीं सकती थीं, फटे - पुराने कपड़े फिर भी चेहरे पे मुस्कुराहट ।
मुझे ऐसे लोगों पर हमेशा से भरोसा नहीं होता, मगर हमेशा की तरह आज भी वासु ने मेरे मना करने के बावजूद उन्हें चाय देने के लिए दद्दा के बोल ही दिया। खैर मैं जानता था वासु ऐ करेगा, अब मैं उसे इस बारे में समझाता भी नहीं ।
उन्होंने अपना सामान वही रखा और सामने ही बैठ गए , और ऐ सब दुबारा अपनी चर्चा में लग गए । मेरी आँखें अभी भी उन दोनों पर टीकी थीं, चाय के आने पर दादी ने अपने झोले से एक कटोरा निकाला शायद ग्लास से गर्म चाय पीने में उन्हें दिक्कत हो रही थी । फिर दादा ने एक ग्लास की चाय उनके कटोरे में डाल दिया , उसके बाद दादी के चेहरे पर एक मुस्कान फुटी वो अभी भी अपने कटोरे को दादा के आगे कीए थीं । फिर मुस्कुराते हुए दादा ने अपने ग्लास से भी आधी चाय उनके कटोरे में डाल दी और हल्के से उनके सर पे सहलाया, अब दादी चाय पी रही थी और दादा की प्रेम और संतोष से भरी आँखे उन्हें निहार रही थी ।
 लेशमात्र भी स्वार्थ नहीं  तनीक भी कोई और भाव नहीं बस विशुद्ध मुहब्बत और आँखों से उमडता प्रेम । मेरी हालत उस इन्सान के जैसे थी जिसके सामने साक्षात् कोई ईश्वरीय दृश्य हो ,  कृष्ण और राधा का प्रेम भी ऐसा ही रहा होगा या शायद उस प्रेम में भोग की , काम की पीपासा होगी । यह तो दो आत्माओं का प्रेम था किसी भी सांसारीक दुख ,किसी भी लोभ से कहीं उपर । बस प्रेम की एक अनुभुती एक दिव्य बंधन ।
पहली बार किसी के सामने मैनें खुद को इतना गरीब इतना तुच्छ पाया ।
इससे पहले मैं उठता , कुछ पुछता वो दुबारा आगे बढ चुके थे ," कुछ दे दो बेटा, कुछ दे दो "।
कैसे बताउँ उन्हें कितने अमीर हैं वो और मैं कीतना गरीब ?
क्या दे सकता हूँ मैं उन्हें ?

Saturday, 28 November 2015

बाॅयोलाजी की किताब से साँप और राक्षस निकलते हैं .....

" सर मैं रात में सो नहीं पाता, मेरे सपने में मुझे बाॅयोलाजी की किताब से साँप और राक्षस निकलते नजर आते हैं । मैं यहाँ नहीं रह पाउँगा | "
ऐ शब्द है कोटा के ऐलन में AIPMT की कोचींग कर रहे एक छात्र के। पिछले एक साल में कोटा में 24 छात्रों ने आत्महत्या की है। पुरे देश की बात करें तो सिर्फ बोर्ड एक्जाम के बाद के महीने में 2,406 छात्रों ने आत्महत्या कर ली, खुदा जाने क्यूँ इतनी घटनाओं के बावजूद भी कभी ऐ मुद्दा मीडिया या कर्णधारों के आँखों में नहीं आती।
आज किसानों की आत्महत्या को लेकर पुरे देश में रोश है, कोई भी राजनीतिक इन्सान शायद ही बचा हो जिसने इस मुद्दे पर बयान ना दिया हो | इससे भी बड़ी त्रासदी होने के बावजूद छात्रों की मौत  से किसी को गरज नहीं है |
क्या सिर्फ इसलीए क्युंकी यह छात्र आपकी राजनीती का हिस्सा नहीं हैं ? क्युंकी ऐ 18 से कम उम्र के हैं?
क्यूंकि वे सरकार नहीं बनाते ?
वाह री राजनीति , वाह रे देश  । क्या उस शख्स के कोई अधिकार है ही नहीं जो व्यस्क न हुआ हो ?

Thursday, 26 November 2015

लोकतंत्र हार गया

पिछले कुछ समय से रामगढ में विकास की बयार आई थी।उम्र भर बदहाल रहने वाली गलियों की सड़कें , जो खुद को सड़क कहने से पहले तिलमिला जाती थीं, वो अचानक इस कदर निखर उठी की देखकर संगमरमर भी शर्मा जाए।
चलते - फिरते सड़कों में खुद को तथाकथित स्वंयसेवकों की फौजें नजर आने लगीं ।
आखिरकार हफ्तों की गहमागहमी की बाद चुनाव परिणाम आए। मैं परिणाम के बाद घंटों तक दरवाजे पर खड़ा रहा मगर" नाली की मरम्मत" का वादा करने वाले नेताजी कहीं नजर नहीं आए, हाँ! आगे कुछ दुरी पर नेताजी का बडा सा पोस्टर नाली के मुहाने पर धरना दिए जरूर बैठा था, मानो चिल्ला - चिल्ला कर कह रही हो कि हम नेताजी के नुमाइंदे हैं, हमारी आदेश के बिना मजाल है ककी पानी का एक भभी कतरा आगे बढ़ जाए ।
मैं अभी इस दृश्य को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि सामने से नेताजी की राजकीय सवारी निकली। सोमरस के आनंद में ढुबे अनुनायी , और कल तक हाथ जोड़ कर घर घर घूमने वाले नेताजी खुली जीप में रूआब से पान की पीक मुँह में दबाए फोन पर किसी का शुभसंदेश ले रहे थे।
श्रद्धा में मेरी भी आँखें भर आयीं,हाथ जुडने ही वाले थे तभी अचानक कर्णप्रिय" One bottle down" की धुन कानों में पडी , मैं बेचारा अदना सा नागरिक इस सोच में डुब गया कि कल तक " देशप्रेमियों" के धुन से सराबोर था, इस परिवर्तन का कारण समझ पाता कि नेताजी के पावन मुख से निकली पान की पीक मेरे जुतों को लालकर गई।
मैं तो नतमस्तक हो गया उसी क्षण की वाह क्या सम्रपण है,नेताजी ने वादा किया था सड़कों को गन्दा नहीं होने देंगे, और देखो मेरे जुते भले लाल हुए सड़क अभी भी साफ है।रामगढ की जनता भले निराश हो मुझे विश्वास है कि परिवर्तन जरूर लाभकारी होगा।
बाइक पर ट्रिपल लोड बिना हेलमेट रैली निकालने वाले ट्रैफिक नियमों का ख्याल जरूर रखेंगे।
जो नेताजी 11बजे रात लोगों को घर बुलाकर" मुर्गा -भात" खिला ररहे थे वो जनता की भुख का ख्याल जरूर रखेंगे।
हम 1500₹ स्कूल की फीस देते हैं तो मन से पढते हैं, वो १५ लाख खर्च करके मुखिया बने हैं  वो जरूर अपना काम तन-मन से करेंगे , और कुछ मुर्ख कहते हैं लोकतंत्र हार गया अरे यह तो जीत हहै जीत।

Sunday, 25 October 2015

आधुनिक नारी - दर्शन


कल क्लास के ग्रुप में एक सहपाठी छात्रा ने महिलाओं का गुणगान करने वाला एक संदेश प्रेषित कीया।
इसमें एक स्वामीजी के प्रवचन का उद्धरण देते हुए पुरुषों को लोहे के समान तथा महिलाओं को हिरे के समान बतलाया था ।
ऐसा नहीं है कि मैं महिलाओं का विरोधी हुँ।
लेकिन इस तरह के विचार देखकर न जाने क्यों ससनसनी सी दौड़ जाती है।
आप सुबह उठकर उम्मीद करती हैं कि आपका पुरूष मित्र आपको फोन करके प्रेमालाप करेगा , आप फोन नहीं करेंगे क्योंकि आप महिला हैं ।
बस में आप उम्मीद करती हैं आपको खड़ा देख कोई पुरुष सीट छोड़ दे । क्योंकि आप महिला हैं !
लिफ्ट में जाते वक्त अगर वजन लिमिट से ज्यादा हो जाए तो कोई लडका उतर जाए ।क्योंकि आप एक महिला हैं!
आप चाहती हैं  की शिक्षक कक्षा में आपसे नम्रता से बात करे, गलती होने पे नजर अंदाज करे । क्योंकि आप एक महिला  हैं!
ऐसे और न जाने कई बिंदु हैं जहाँ आप खुद को अपने ही मुख से कमजोर  कहती हैं।
माफ किजीएगा मगर मुझे नहीं लगता आप एक ऐसा समाज चाहती हैं जहाँ स्त्री -पुरुष समानता हो ।
आप एक महिला प्रधान समाज की स्थापना  चाहती हैं, जहाँ सब कुछ आपके मुताबिक़ हो । आपकी सहूलियत के हिसाब से।
माफ किजीएगा मगर यह न हीं न्याय संगत है न ही तर्कसंगत।
और अंत में बता दुँ लोहा आधार होता है, जबकि हिरा कीमती होकर भी मात्र श्रिंगार की वस्तु।
तो स्त्री को हिरा बताकर उसे श्रिगांर और विलासिता भर में सिमित न कर दें।

Thursday, 15 October 2015

कहरों का कहर


आम आदमी की ज़िन्दगी ठीक वैसी है, जैसी किसी विशाल जंगल में मेमने की होती है. हर कदम पर मौत. सड़क हादसे से बच गए तो मिलावट मार सकती है. मिलावट से बच गए तो गलत इलाज मार सकती है. इलाज सही मिल गया तो अस्पताल का भारी भरकम बिल मार सकता है. और तो और एक छोटे से मच्छर से भी उसे बच कर संभल कर रहना है.
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‪#‎डेंगू‬

Wednesday, 14 October 2015

एक और बेमेल ब्याह


भाजपा - जदयु गठबंधन को बिना मेल का ब्याह बताकर मिडीया में सुर्खियाँ बटोरने वाले लालु ने जब महागठबंधन की बात की तो यह सपष्ट हो गया भारत में राजनीतिक विवाह के लिए अब सोलह गुणों का मिलना अनिवार्यता नहीं रह गई है।
इसी कड़ी में एक और नाम जोडते हुए शिवसेना ने बिगुल फुँक दिया है , वो कमर कसकर मैदान में कूद पड़ी है । कभी बिहारियों की धुर विरोधी माने जाने वाली शिवसेना का बिहार में चुनाव लडना भी बदलती राजनीतिक बयार को दर्शाती है ।
पड़ताल की आवश्यकता है कि अचानक उठी इस सियासी भंवर की जड़ कहाँ है ? और आवश्यकता है यह सुनिश्चित करने की कि इस भंवर मे नेस्तानाबुत होने वाला पात्र भारत का आम नागरिक नहीं होगा।
जब राष्ट्र में ऐसी स्थिति हो कि गद्दी पाने के लिए कोई भी किसी का गला काटने को तैयार हो, कोई भी अपनी विचारधारा की बलि चढ़ाने को तैयार हो तो जनता किसपर विश्वास करे ?