आज जब हम भारतीय इतिहास की
या स्वतंत्रता के 10-20 वर्षों के बाद के भारत की करते हैं तो जिन दस्तावेजों का
या जिन किताबों का हम उद्धरण हम लेते हैं वो उस वक्त को अपने हिसाब से ढालने वाले
एकमात्र सगंठन कांग्रेस और उस विचारधारा से सबंधीत लोगों सो संबदीत होती है । भारत
का संपुर्ण इतीहास माना जाने वाला भारत की खोज भी हमारे सम्मानीय प्रथम प्रधानमंत्री
महोदय जवाहर लाल नेहरु के द्वारा लिखा गया है । मेरे एक मित्र के द्वारा दिया गया
तर्क याद आता है की " क्या आपने कभी किसी पुलिस थाने में जाकर खुद के खिलाफ़ कोई
शिकायत लिखवाई है , की आज मैं बिना हेलमेट के गाड़ी चला रहा था ?" ।
जब आपको इस बात का ज्ञान हो
की आपके द्वारा लिखा जा रहा दस्तावेज भवीष्य में आपके ही महानता की वर्णन गाथा
बनेगी तो मैं कैसे मान लुँ की खुद को श्रेष्ट सिद्ध करने के लिए आपने उसमें अपनी
सहुलियत के हिसाब से छेड़खानी नहीं की होगी ।
मैं हमेशा से मानता रहा हुँ
की भारत का जो संपुर्ण इतिहास हम पढ़ते आए हैं वो विभत्स है अधुरा है । इतीहास को
पढ़ते वक्त हम उस हाथ में लाठी लिए अँथे पुरुष की भाँती होते हैं जो खुद कुछ नहीं
देख सकता , उसे अपने आस पास के सारे वातावरण का अंदेशा उस व्यक्ती के हिसाब से
लगाना पड़ता है जो हाथ पकड़ कर उसे रास्ता दिखा रहा है । इतीहास का अध्यन करते वक्त
हम भी अँधे हो जाते हैं एवं बस इतिहासकार की उँगली पकड़कर अपना फैसला सुना देते
हैं ।।
आज अगर कोइ ऐसा व्यक्ती जो
मुझसे बहुत प्रभावीत है मेरे विषय में एक पुस्तक लिखकर मेरे गुणों का बखान करता है,
और वह पुस्तक सैकड़ों सालों के बाद किसी के द्वारा पढ़ा जाता है तो मैं निश्चित
तौर पर उस व्यक्ती के लिए मर्यादा एवं आदर्शों की मुर्ती बन जाउँगा जबकी
वास्तविकता उसके बिल्कुल उलट क्युं ना हो , ठीक इसी तरह मेरे विरोधी के द्वारा
लिखी गई एक किताब भविष्य की निगाहों में मुझे दानव सिद्ध कर सकती है ।
आज जिन नेताओं को हम भारत
का युगनिर्माता मानते हैं उनको आदर्श सिद्ध करने वाली अधीकतर रचनाँए उस काल की हैं
जब वो सत्ता में अथवा शक्ती के केन्द्र में थे । आज कोइ यह सवाल नहीं पुछता की किन
सबुतों के आधार पर विर सावरकर को गाँधी हत्या में दोषी सिद्ध किया गया है ।
कोई नहीं पुछता की कैसे
गाँधी हत्या का सहआरोपी रहा दिगम्बर बड़गे जो सरकारी गवाह बनकर गोड़से बँधुओं तथा
विर सावरकर के ताबुत की कील बना वो मात्र चँद सालों में रिहा हो जाता है और उसके
बाद किस आधार पर भारतीय पुलिस में नियुक्त कर लिया जाता है ।
कोई नहीं पुछता की सरकारी गवाह
बना आरोपी मदन लाल पहवा, छुटने के बाद कैसे इतनी समपत्ती जुटा लेता है की बम्बई
जैसे शहर में कागज़ की मिलें खरीद लेता है ।
कोई पुस्तक इस बात का विवरण
क्यों नहीं देती की भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायक कहे जाने वाले मोहन दास
करमचँद गाँधी को क्यों सँविधान सभा में जगह नहीं दी जाती और स्वतंत्रता संग्राम
में शुन्य योगदान रखने वाले भिमराव अँबेड़कर को सिर्फ जातीगत राजनिति के नाम पर
संवीधान सभा का सर्वोपरी बना दिया जाता है ?
आजादी के बाद सालों तक भारत
में सिर्फ एक पार्टी , सिर्फ एक विचारधारा राज करती रही और सालों के इस बेरोकटोक
शासन के दौरान जब विपक्ष नदारद था उन्होनें भारत के इतिहास के अस्मिता के रौंद
डाला और योजनाबद्ध तरिके से अपने विरोधियों को खलनायक साबित करने का हर वो सँभव
प्रयास किया जिससे की उनका कोइ विरोधी ना पनप पाए और वो एकछत्र राज करते रहें ।
भारतीय इतीहास का समय समय पर
विदेशियों तथा अपने हीं नेताओं के द्वारा बलात्कार होता रहा है इसलीय हमारा
कर्तव्य है की हम इतिहास को पढ़ते वक्त आँखो के साथ दिमाग भी खुला रखें एवं परदे
के पिछे डाल दिए गए तथ्यों पर सवाल उठाँए ।।

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