इस जमाने में झूठ आखिर कब तक बिकता
है,
कितना भी पक्का हो रंग एक दिन उतरता है ।।
रंग रंग और रंग हर तरफ कुछ
है तो सिर्फ रंग । होली के बाद चढ़ा रंग तो खैर फिर भी कुछ दिनों में उतर जाएगा ,
अब हाथों में चढ़ा गाढ़ा हरा रंग हल्का पड़ने लगा है , लोग फिर से बेरंग होने लगे
हैं । पहले होली से मैं भी डरता था , रंगो से डर था एक खौफ कि कहीं इन बनावटी रंगो
में अपना असली रंग ना खो दूँ । ऐसा बिल्कुल नही है की अच्छा रंग था मेरा कोइ खास न
तब था न अब है लेकिन जो भी हो वो मेरा रंग था और अपने से प्रेम तो होता हीं है ।
अक्सर होली के दिन दरवाजे बंद करके छुप जाता था , अपने ही घर में खुद को नज़रबंद कर
लेता था ताकि कोई अपने रंग में ना रंग दे ।
आज जब दुनिया को देखना शुरु
किया है , जब ऐसे स्थान पर आया जहाँ की वैचारिक स्वतंत्रता मिली है । पंख फैलाने
का मौका अब मिला तो क्या देखता हुँ की हर तरफ रंग फैला है , हर किसी ने खुद को रंग
रखा है और अपना असली रंग कहीं छुपा दिया है । बचपन की कहानियों में जब कोइ अपनी
जान तोते में छुपाता था तो पुरी रात में यही सोचने में निकाल देता था की भला
इन्सान अपनी जान तोते में क्यों छिपाए तोते को मारना तो इन्सान को मारने से ज्यादा
आसान है , अब अगर छुपाना इतना ही आसान है तो अपनी जान किसी कछुए, हाथी या शेर में
छुपाओ की मारने वाला भी हजार बार सोचे । अब समझ रहा हुँ की दरअसल तोते में अपने
जान को छुपाने की एक अलग वजह थी , जब अपनी चीज किसी को छुपाने के लिए देनी हो तो
हमेशा कमजोर को देना चाहीए क्या पता कहीं ताकतवर को दे दिया और उसने वापस करने से
मना कर दिया तो । जिन्होनें अपना रंग छुपाया है वो भी बड़े चतुर हैं वो जानते हैं
की अपना रंग अपने पास रखने में बड़ा खतरा है , कहीं किसी ने अपना रंग उन पर दिखाना
शुरु किया तो वो बेरंग हो जाँएगे । अब जैसे ही वो बेरंग होने लगते हैं कहीं से
दूसरा रंग चढ़ा लेते हैं और कहते हैं की वो तो मेरा रंग था है नहीं , इससे रंग भी
बच जाता है और वो रंगने से भी बच जाते हैं ।
इन रंगे हुए चेहरों को
पहचानने के लिए कोइ तरीका मैं तो अब तक नही सोच पाया , ऐ रंगे हुए चेहरे खुबसुरत
तो लगते हैं लेकीन इन बदलते रंगो के बनावटीपन को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाता । कुछ
लोगों के शौक इससे भी अजीब हैं वो खुद को तो इन रंगो में रंगे रहते हैं मगर कोशिश
होती है की वैचारीक होली खेलते हुए सबको किसी न किसी रंग में रंग दें , साफ चेहरे
इनसे बर्दाश्त नहीं होते । मैं अब होली में गुलाल खेल लेता हुँ लेकिन इस वैचारिक
होली से आज भी डरता हुँ, अपना रंग मुझे बहुत प्यारा है ।
editor in charge : upasna :D धन्यवाद :)

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