Friday, 12 February 2016

माता सरस्वती को एक खत


माँ पता चला कि आज आप आयीं थी इस छोटे से पृथ्वी पर, जानकर बहुत प्रसन्न था कि अब आप अपने पुत्रों से जरूर मिल कर जाँएगी मगर लगता है पेट्रोल की बढ रही कीमतों का असर आप पर भी पड़ा है। आप बीच रास्ते से ही लौटकर चली गईं , याद नहीं आता कि माते की आखिरी बार कब आपके दर्शन हुए थे ,मेरे ये नयन आपके दर्शन को तरस गए थे।

 ना ना ना माते ऐसा मत समझो की मैं आपसे इसलिए मिलना चाहता था कि मिलकर कुछ ज्ञान ऐंठ सकुँ, मुझे अपनी औकात का ज्ञान भलीभाँति है,मैं जानता हूँ कि मेरे Database में ज्ञान की फाइल्स  सपोर्ट नहीं करतीं । माता मैं तो आपसे कुछ सवाल करना चाहता था आपसे कुछ  शिकायतें करना चाहता था। खैर आप ना मिलीं तो सोचा चिट्ठी ही लिख दुँ वैसे भी आजकल चिट्ठियों को काफ़ी तरजीह दी जा रही है,किसी को चिट्ठी लिखना आ जाए तो वो सेलेब्रिटी बन जाता है। मुझे कम्प्यूटर प्रोग्रामिंग लिखनी आती है मगर मेरी कोई पुछ नहीं और मैं  एक ऐसे लड़के को जानता हुँ जिसे चिट्ठी लिखनी आती है, उसे रोज लडकियाँ घेर कर चिट्ठियाँ लिखवाती हैं । माता मैं बता दे रहा हुँ ताकी आप समझ  सको की चिट्ठी लिखने के लिए किस ओहदे के समर्पण कि जरूरत होती है, इतने समर्पण से तो बाल्मिकि ने भी आपको नहीं भजा होगा ।

वैसे तो आप विज्ञा की Creator हो मगर लगता है तुमने इसे कहीं कहीं गलत जगह पर इंसटाल कर दिया है,कुछ जगहों पर तो इतनी भारी मात्रा में है कि वो 5000₹ तक ले जाने का दंभ भरते हैं,ऐसा असमान वितरण क्यूँ? क्या हम तुम्हारे बेटे नहीं थे जो हमसे ऐसा बैर रखा । उसे 5000 जितनी दी अच्छी बात है शायद बचपन में वो तुम्हारी एक आवाज पर खड़ा हो जाता होगा, मगर माता कभी तो घुटने मैंने भी मोड़े होगें मुझे 3000 जितना ही दे देती । फीर अचानक याद आया की लक्ष्मी और सरस्वती एक जगह कभी नहीं रहते और अपनी खाली जेब देखकर मैं समझा कि तुम मुझसे कितना प्रेम करती हो ।

मगर माँ तुम्हारे और लक्ष्मी मौसी के झगडे में तुम्हारे इस बेटे को बहुत तकलीफ सहनी पड रही है । वैसे तो माँ ऐ युनिवर्सिटी वाले तुम्हे और मौसी को मिलाने की कोशीशें कर रहे हैं, ऐ सरस्वती वालों को लक्ष्मी दे रहे हैं ,मगर माँ ऐ तुम्हारी उपस्थीती का पता परिक्षा से लेते हैं और उस परिक्षा को देने के लिए भी लक्ष्मी देनी पडती है । पिछले साल तो तुम्हारा एक बेटा लक्ष्मी मौसी को नहीं ला पाया तो उन्होंने चेक ही नहीं किया कि तुम उसके अंदर हो की नहीं । माँ तुम उपर में जाँच आयोग बैठाओ मुझे ऐसा लगता है कि तुम्हारी रसोई का खाते हैं मगर इन्होंने लक्ष्मी मौसी से हाथ मिला लिया है ।


बाकी बातें। अगले खत में लिखता हुँ।








जवाब के इतंजार में
तुम्हारा बेटा
सौरभ

Tuesday, 19 January 2016

व्यस्तता का दंभ

काफी दिनों तक बेरोजगार रहने के बाद अचानक से इतना 
व्यस्त हो गया मानो किसी मंत्री के काले धन का हिसाब रखने 
की जिम्मेदारी मिल गई हो ,पुराना समय कितना खुबसुरत था ।

सबकुछ हौले हौले चलता रहता था ,न तो आपको किसी से उधार 
वसुलना होता है न महिला मित्र से घंटो बतियाने की जरुरत,बस उपजाओ 
और खाओ ।
ऐ अलग बात है की ईतनी फुर्सत में होने के बावजुद देवताओं कभी इसका 
सही इस्तेमाल नहीं किया । कभी समय मिला तो जाकर किसी को वरदान 
दे दिया । कभी फुर्त मिली तो जाकर कुंती समान किसी महिला को पुत्र दे 
दिया ।
देवताओं की हमेशा से हीं वृत्ती रही है की जिसे जिस वस्तु की आव्यशकता
नहीं है उसे वो जरुर देते हैं कभी communication gap  के कारण इंद्राशन 
माँग रहे कुँभकरण को निंद्राशन दे दिया तो कभी जबरजस्ती जिन्हे सत्ता 
जहर लगती है उन्हे सत्ता दे दी.. अब इश्वर पर ज्यादा आरोप प्रत्यारोप 
नहीं वरना उसने बदला लेना शुरु किया तो मैं बदले की राजनिती का आरोप
भी नहीं लगा सकता , मेरे साथ तो भीड़ भी आने से रही ।
खैर व्यस्तता पर वापस लौटते हैं । कहते हैं आव्यश्कता हीं आविष्कार की जननी है, 
ठीक उसी प्रकार बेकारी ही व्यस्तता की जननी है । व्यस्त होने का सबसे बडा फायदा
ऐ है की आपको व्यस्त होने का बहाना नहीं करना पड़ेगा .. दुसरा फायदा मम्मी 
पापा को लगता है की बेटा बड़ा हो गया है, सच्चाई तो हमें पता है । 
आप मेरे इस छोटे से लेख को अन्यथा ना लें, इसे लिखने का मकसद ही यही है 
की दुनिया तो पता चले की मैं व्यस्त हुँ ।
अब भाई व्यस्तता कोई घोटाला तो है नहीं की रोज रोज हो , बेकार के लिए 
व्यस्तता की खुशी ऐसी होती है जैसे की गँजे के सर में रांतो रात फसल लहा लहा 
जाए या बाँझ को जुड़वा औलाद हो जाए । मैं इस आनंद का आनंद लेता हुँ आप तब
तक मेरे आप तब तक मेरे आतंक से मुक्ती का जश्न मनाँए , मगर बता दुँ 
आपकी ऐ खुशी क्षणभंगुर है मैं जल्द वापस लौटुँगा ।

-     आपका कथाकथीत प्रिय

     कुमार सौरभ

Sunday, 3 January 2016

मेरी कलम अछुत है।


साहित्य में एक समस्या है कि यहाँ लेखक नहीं लेख अमर होते हैं, हाँ! अगर आप ५-१० अमर लेखों के उत्पादनकर्ता हैं तो आप भी अमर हो सकते हैं। वास्तविकता में लेखकों की जात बड़ी शर्मीली होती है, जब कहीं अमर होने की संभावना बनती है तो कछुए की तरह खोल में सर छुपा के बैठ जाते हैं  । खैर भ्रमित न हों मेरा अमर होने का कोई उद्देश्य नहीं है, गुगल एडसेन्स के कमाई से महीने का राशन चल जाता है , ज्यादा कुछ की तमन्ना भी नहीं है।
अमर होने में भी भाई - भतीजा वाद हावी है,कोई अमर हुआ तो साथ में भवानी बनाकर तलवार को तो किसी ने चेतक कहकर घोड़े को अमर कर दिया  । उसी तरह तलवार और न जाने क्या क्या बोलकर लेखकों ने कलम को अमर कर रखा है। मैं ठहरा विद्रोही बदलाव मुझसे बर्दाश्त होते नहीं,मुझे तो कलम में भी जात नजर आती है, होती भी है। कलमों में भी उँच निच होता है। मैं आपको कलमों की जात के बारे में बताता हूँ।
प्रेमचंद, कालिदास, ग़ालिब की कलम जेनरल कैटेगरी ककी कलम थी, उम्र भर घिसती रही मगर एक ढंग का जुता भी नसीब नहीं हुआ। उम्र भर बेगम से  बेलन  खाए होंगे सो अलग  और उसी बेलन का दर्द उभर-उभर कर कहानियों और शायरीयों में नजर आता रहा।उम्र 4 *4 के कमरे में कट गई क्योंकि जेनरल कटेगरी ककी कलम थी।
अब अफसरों के कलम को ले लें फर्राटेदार चलती है, जेनरल कलम को मुँह चिढाती करोंडों के टेंडर पास करवाती है, कलम भी लाखों खाती है।ऐ कलम तो कागज पर ही तालाब और कुँए भी बना देती है, ऐ है OBC कलम ।
इसके उपर भी एक कलम है, SC/ST कलम ।ऐ कलम सोने की परत चढ़ी होती है ताकि कहीं खराब न हो जाए। आमतौर पर नेताओं के जेब में दिखती है, चलते वक्त थोड़ा लडखडाती है मगर इसकी ताकत का अंदाजा इससे मत लगाइये । जब यह कलम चलती है तो बाकी सब बस बैठकर देखते हैं। आमतौर पर इसका कार्यक्षेत्र कागज के निचे दाहीने कोने पर होता है , मगर पुरे कागज़ की उपयोगिता इसी से तय होती है ।
अब ज्यादा लिखूँगा तो कहीं मेरी कलम दम न तोड़ दे यह समझने में की उसकी जात क्या है?
मेरी कलम अनारक्षीत ही रहे तो बेहतर है। मैं अक्षुत ही रहुँ तो बेहतर है। मैं दूर हीं रहुँ तो बेहतर है।

Monday, 21 December 2015

पात्र एंव घटनाँए पुर्णत काल्पनिक हैं


इंसान एक प्रगतीशिल प्राणी है । हम जरुरत के हिसाब से बदलना जानते हैं , अपने इस गुण के कारण तो आजतक अस्तित्व में हैं । मगर न जाने क्युँ ,मैं चाह कर भी बदलाव की ईस धारा में समा नहीं पाता  ।
मेरे एक संभ्रात मित्र हैं , न न मजाक नहीं कर रहा , अरे भाई इंसान तो कुत्ते को भी मित्र रख लेता है बस इसी तरह उन्होनें मुझे मित्र रखा हुआ है , इस उपकार के लीए मैं उनका ऋणी हुँ ,सदैव रहुँगा ।
हाँ तो ! संभ्रात मित्र हैं , काफी प्रगतीशील विचारों के स्वामी हैं , अफसरों के बीच बैठते हैं , ऊँची पैठ रखते हैं । शायद उनकी भलमनसाहत है कि मेरी मुर्खता उनसे देखी नहीं जाती , मुझे समझाते हैं ।
अरे सौरभ ! जब लोग कपडे बदलते हैं , साबुन - तेल बदलते हैं , विचारधारा बदलते हैं , तो तुम क्युं नहीं बदलना चाहते ?
उनकी चिंता जायज भी है । हमारा समाज हमेशा से बदलाओं का पक्षधर रहा है ।
देखो हम मुगलों को बदलकर अंग्रेज ले आए , 1947 में हमने देश का नक्शा बदल दिया , हमनें क्रांतीकारियों की भुमिका बदल दी । हमारे नेता अब तक 100 बार कानुन बदल चुके हैं , उन्नती के लिए विचारधारा ,पार्टी तक बदल देते हैं । हमने मंदिरों को प्रेम स्मारकों में बदल दिया , और मैं हुं की बदलने को तैयार नहीं ।
वो समझाते हैं, दिग्गी जी ने बीवी बदल ली , देखो जरा चेहरे पर कैसी लाली है । मेरे पडोसी को हीं देख लो , आरक्षण के लिए बाप बदल दिया और हजारों कमा रहे हैं । अरे लोग तो जरुरत पड़ने पर बहनों को बीवी में बदल लेते हैं , तुम भी तो रोज कलम बदलते हो , लेकिन विचार बदलने को तैयार नहीं ।
खुद को प्रगतीशील लेखक कहलवाते हो और बदलाव नहीं झेल पाते ? खैर ज्यादा नहीं लिख पाउँगा अभी अभी खबर मिली है की मेरे मीत्र चुनावी ड्युटी के दौरान EVM बदलते धराए हैं ।
 

Wednesday, 2 December 2015

एक विशुद्ध प्रेमी


कमप्युटर की  क्लास में मिली धमकी के बाद क्लास में रूकने की ना हिम्मत बची थी न कोई मतलब ।
किसी तरह हिम्मत जुटाता विश्वविधालय से निकलकर हम बगीया पर पहुंचे । जब हिम्मत टुट रही हो और पर्स भी हल्का हुआ पड़ा हो तो  चाय से बेहतर साथी कोई नहीं होता । अपनी इसी मुहब्बत के साथ हम सब बैठे थे , कोई अपनी कहानी बयाँ करने में लगा था कोई विश्व राजनीति में।
हमेशा की भाती " कुछ दे दो बेटा" आवाज आई । बगीया में बैठे हुए ऐ कोई नई बात नहीं थी, मगर आज ऐ नए लोग थे । आँखें उपर उठी तो देखा एक दादा जी करीब 70-75 की उम्र होगी ने दादी का हाथ पकड़ रखा था , दादी देख नहीं सकती थीं, फटे - पुराने कपड़े फिर भी चेहरे पे मुस्कुराहट ।
मुझे ऐसे लोगों पर हमेशा से भरोसा नहीं होता, मगर हमेशा की तरह आज भी वासु ने मेरे मना करने के बावजूद उन्हें चाय देने के लिए दद्दा के बोल ही दिया। खैर मैं जानता था वासु ऐ करेगा, अब मैं उसे इस बारे में समझाता भी नहीं ।
उन्होंने अपना सामान वही रखा और सामने ही बैठ गए , और ऐ सब दुबारा अपनी चर्चा में लग गए । मेरी आँखें अभी भी उन दोनों पर टीकी थीं, चाय के आने पर दादी ने अपने झोले से एक कटोरा निकाला शायद ग्लास से गर्म चाय पीने में उन्हें दिक्कत हो रही थी । फिर दादा ने एक ग्लास की चाय उनके कटोरे में डाल दिया , उसके बाद दादी के चेहरे पर एक मुस्कान फुटी वो अभी भी अपने कटोरे को दादा के आगे कीए थीं । फिर मुस्कुराते हुए दादा ने अपने ग्लास से भी आधी चाय उनके कटोरे में डाल दी और हल्के से उनके सर पे सहलाया, अब दादी चाय पी रही थी और दादा की प्रेम और संतोष से भरी आँखे उन्हें निहार रही थी ।
 लेशमात्र भी स्वार्थ नहीं  तनीक भी कोई और भाव नहीं बस विशुद्ध मुहब्बत और आँखों से उमडता प्रेम । मेरी हालत उस इन्सान के जैसे थी जिसके सामने साक्षात् कोई ईश्वरीय दृश्य हो ,  कृष्ण और राधा का प्रेम भी ऐसा ही रहा होगा या शायद उस प्रेम में भोग की , काम की पीपासा होगी । यह तो दो आत्माओं का प्रेम था किसी भी सांसारीक दुख ,किसी भी लोभ से कहीं उपर । बस प्रेम की एक अनुभुती एक दिव्य बंधन ।
पहली बार किसी के सामने मैनें खुद को इतना गरीब इतना तुच्छ पाया ।
इससे पहले मैं उठता , कुछ पुछता वो दुबारा आगे बढ चुके थे ," कुछ दे दो बेटा, कुछ दे दो "।
कैसे बताउँ उन्हें कितने अमीर हैं वो और मैं कीतना गरीब ?
क्या दे सकता हूँ मैं उन्हें ?

Saturday, 28 November 2015

बाॅयोलाजी की किताब से साँप और राक्षस निकलते हैं .....

" सर मैं रात में सो नहीं पाता, मेरे सपने में मुझे बाॅयोलाजी की किताब से साँप और राक्षस निकलते नजर आते हैं । मैं यहाँ नहीं रह पाउँगा | "
ऐ शब्द है कोटा के ऐलन में AIPMT की कोचींग कर रहे एक छात्र के। पिछले एक साल में कोटा में 24 छात्रों ने आत्महत्या की है। पुरे देश की बात करें तो सिर्फ बोर्ड एक्जाम के बाद के महीने में 2,406 छात्रों ने आत्महत्या कर ली, खुदा जाने क्यूँ इतनी घटनाओं के बावजूद भी कभी ऐ मुद्दा मीडिया या कर्णधारों के आँखों में नहीं आती।
आज किसानों की आत्महत्या को लेकर पुरे देश में रोश है, कोई भी राजनीतिक इन्सान शायद ही बचा हो जिसने इस मुद्दे पर बयान ना दिया हो | इससे भी बड़ी त्रासदी होने के बावजूद छात्रों की मौत  से किसी को गरज नहीं है |
क्या सिर्फ इसलीए क्युंकी यह छात्र आपकी राजनीती का हिस्सा नहीं हैं ? क्युंकी ऐ 18 से कम उम्र के हैं?
क्यूंकि वे सरकार नहीं बनाते ?
वाह री राजनीति , वाह रे देश  । क्या उस शख्स के कोई अधिकार है ही नहीं जो व्यस्क न हुआ हो ?

Thursday, 26 November 2015

लोकतंत्र हार गया

पिछले कुछ समय से रामगढ में विकास की बयार आई थी।उम्र भर बदहाल रहने वाली गलियों की सड़कें , जो खुद को सड़क कहने से पहले तिलमिला जाती थीं, वो अचानक इस कदर निखर उठी की देखकर संगमरमर भी शर्मा जाए।
चलते - फिरते सड़कों में खुद को तथाकथित स्वंयसेवकों की फौजें नजर आने लगीं ।
आखिरकार हफ्तों की गहमागहमी की बाद चुनाव परिणाम आए। मैं परिणाम के बाद घंटों तक दरवाजे पर खड़ा रहा मगर" नाली की मरम्मत" का वादा करने वाले नेताजी कहीं नजर नहीं आए, हाँ! आगे कुछ दुरी पर नेताजी का बडा सा पोस्टर नाली के मुहाने पर धरना दिए जरूर बैठा था, मानो चिल्ला - चिल्ला कर कह रही हो कि हम नेताजी के नुमाइंदे हैं, हमारी आदेश के बिना मजाल है ककी पानी का एक भभी कतरा आगे बढ़ जाए ।
मैं अभी इस दृश्य को समझने की कोशिश ही कर रहा था कि सामने से नेताजी की राजकीय सवारी निकली। सोमरस के आनंद में ढुबे अनुनायी , और कल तक हाथ जोड़ कर घर घर घूमने वाले नेताजी खुली जीप में रूआब से पान की पीक मुँह में दबाए फोन पर किसी का शुभसंदेश ले रहे थे।
श्रद्धा में मेरी भी आँखें भर आयीं,हाथ जुडने ही वाले थे तभी अचानक कर्णप्रिय" One bottle down" की धुन कानों में पडी , मैं बेचारा अदना सा नागरिक इस सोच में डुब गया कि कल तक " देशप्रेमियों" के धुन से सराबोर था, इस परिवर्तन का कारण समझ पाता कि नेताजी के पावन मुख से निकली पान की पीक मेरे जुतों को लालकर गई।
मैं तो नतमस्तक हो गया उसी क्षण की वाह क्या सम्रपण है,नेताजी ने वादा किया था सड़कों को गन्दा नहीं होने देंगे, और देखो मेरे जुते भले लाल हुए सड़क अभी भी साफ है।रामगढ की जनता भले निराश हो मुझे विश्वास है कि परिवर्तन जरूर लाभकारी होगा।
बाइक पर ट्रिपल लोड बिना हेलमेट रैली निकालने वाले ट्रैफिक नियमों का ख्याल जरूर रखेंगे।
जो नेताजी 11बजे रात लोगों को घर बुलाकर" मुर्गा -भात" खिला ररहे थे वो जनता की भुख का ख्याल जरूर रखेंगे।
हम 1500₹ स्कूल की फीस देते हैं तो मन से पढते हैं, वो १५ लाख खर्च करके मुखिया बने हैं  वो जरूर अपना काम तन-मन से करेंगे , और कुछ मुर्ख कहते हैं लोकतंत्र हार गया अरे यह तो जीत हहै जीत।